Sunday, April 18, 2021

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 RTI Act 2005 Right to information act 2005


 सूचना का अधिकार अधिनियम,2005


 15 जून 2005 को इसे अधूरा किया गया और पूर्णतया 12 अक्टूबर 2005 को सम्पूर्ण प्रवाह के साथ लागू कर दिया गया।  सूचना का अधिकार  सूचना का अधिकार का तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार, जो सूचना अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है।  सूचना अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने नागरिकों को, अपने कार्य को और शासन प्रणाली को जनता करता है।

 लोकतंत्र में देश की जनता अपनी तारीखें व्यक्ति को शासन करने का अवसर प्रदान करती है और यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी और कर्मनिष्ठा के साथ अपने निवेश का पालन करेगी।  लेकिन कालानार में अधिकांश राष्ट्रों ने अपने उत्पादों का गला घोटते हुए विस्तार और ईमानदारी की बोटियाँ नोंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कीर्तिमान कायम करने को एक भी मौका अपने हाथ से गवाना नहीं भूले।  भ्रष्टाचार के इन कीर्तिमानों को स्थापित करने के लिए हर वो कार्य किया जो जनविरोधी और अलोकतांत्रिक हैं।  सरकारे यह भूल जाती है कि जनता ने उन्हें चुना है और जनता ही देश की असली मालिक है और सरकार उनका चुना हुआ नौकर है।  इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है, कि जो सरकार उनकी सेवा में है, वह क्या कर रही है?

 प्रत्येक नागरिक सरकार को किसी ने किसी माध्यम से टेक्स देती है।  यहां तक ​​एक सूट से लेकर एक माचिस तक का कर अदा करता है।  सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी भी जब बाजार से कोई सामान खरीदता है, तो बिक्री कर, उत्पाद कर इत्यादि टैक्स अदा करता है।

 इसी प्रकार के देश का प्रत्येक नागरिक टैक्स अदा करता है और यही टैक्स देश के विकास और व्यवस्था की आधारशिला को निरन्तर स्थिर रखता है।  इसलिए जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके द्वारा दिया गया, पैसा कब, कहां, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है?  इसके लिए यह आवश्यक है कि सूचना को जनता के समक्ष रखने और जनता को प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया जाए, जो एक कानून द्वारा ही संभव है।)  सूचना का अधिकार  सूचना का अधिकार का तात्पर्य है, सूचना पाने का अधिकार, जो सूचना अधिकार कानून लागू करने वाला राष्ट्र अपने नागरिकों को प्रदान करता है।  सूचना अधिकार के द्वारा राष्ट्र अपने नागरिकों को अपने कार्य और शासन प्रणाली को जनता करता है।

 लोकतंत्र में देश की जनता अपनी तारीखें व्यक्ति को शासन करने का अवसर प्रदान करती है और यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी और कर्मनिष्ठा के साथ अपने निवेश का पालन करेगी।  लेकिन कालानार में अधिकांश राष्ट्रों ने अपने कर्मचारियों का गला घोटते हुए विस्तार और ईमानदारी की बोटियाँ नोंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े कीर्तिमान कायम करने को एक भी मौक अपने हाथ से गवाना नहीं भूले।  भ्रष्टाचार के इन कीर्तिमानों को स्थापित करने के लिए हर वो कार्य किया जो जनविरोधी और अलोकतांत्रिक हैं।  सरकारे यह भूल जाती है कि जनता ने उन्हें चुना है और जनता ही देश की असली मालिक है और सरकार उनका चुना हुआ नौकर है।  इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है, कि जो सरकार उनकी सेवा है, वह क्या कर रही है?

 प्रत्येक नागरिक सरकार को किसी ने किसी माध्यम से टेक्स देती है।  यहां तक ​​एक सूट से लेकर एक माचिस तक का कर अदा करता है।  सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी भी जब बाजार से कोई सामान खरीदता है, तो बिक्री कर, उत्पाद कर इत्यादि टैक्स अदा करता है।

 इसी प्रकार के देश का प्रत्येक नागरिक टैक्स अदा करता है और यही टैक्स देश के विकास और व्यवस्था की आधारशिला को निरन्तर स्थिर रखता है।  इसलिए जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके द्वारा दिया गया, पैसा कब, कहां, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है?  इसके लिए यह आवश्यक है कि सूचना को जनता के समक्ष रखने और जनता को प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया जाए, जो एक कानून द्वारा ही संभव है।)  अंग्रेज़ों ने भारत पर लगभग 250 वर्षो तक शासन किया और इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत में शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनया, जिसकी अंतर्गत सरकार को यह अधिकर हो गया कि वह किसी भी सूचना को गोपनीय कर सकेगी।

 सन् 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, लेकिन संविधान निर्माताओ ने कॉन्स्ट में इसका कोई भी वर्णन नहीं किया और न ही अंग्रेज़ो का बनाया हुआ शासकीय गापनीयता अधिनियम 1923 का संशोधन किया।  आने वाली सरकारों ने गोपनीयता अधिनियम 1923 की धारा 5 व 6 के प्रावधानों का लाभ उठकर जनता से सूचनाओं को छुपाती रही।

 सूचना के अधिकार के प्रति कुछ सजगता वर्ष 1975 के प्रारंभ में “उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राज नारायण” से हुई।

 मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में हुई, जिसमें न्यायालय ने अपने आदेश में लोक प्राधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यो का व्यौरा जनता को प्रदान करने की व्यवस्था की।  इस निर्णय ने नागरिकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का चार्टररा बढ़ाकर सूचना के अधिकार को शामिल किया गया।

 वर्ष 1982 में द्वितीय राष्ट्रपति आयोग ने शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 की विवादास्पद धारा 5 को रद्द करने की सिफारिश की थी, क्योंकि इसमें कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया था कि 'गुप्त' क्या है और 'शासकीय गुप्त बात' क्या है?  इसलिए परिभाषा के अभाव में यह सरकार के निर्णय पर निर्भर था, कि कौन सी बात को गोपनीयता माना जाए और किस बात को सार्वजनिक किया जाए।

 बाद के वर्षो में वर्ष 2006 में 'विरप्पा मोइली' के गठन में 'द्वितीय प्रशासनिक आयोग' का गठन इस कानून को रद्द करने की सिफारिश की गई।

 सूचना के अधिकार की मांग का विरोध करने से हुई।  राज्य में सूचना के अधिकार के लिए 1990 के दशक में जनान्दोलन की शुरुआत हुई, जिसमें मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) द्वारा अरूणा राय की अगुवाई में भ्रष्टाचार के भांडाफोड़ के लिए लोकुनवाई कार्यक्रम के रूप में हुई।

 1989 में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद बीपी सिंह की सरकार सत्ता में आई, जिसने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वायदा किया।  3 दिसंबर 1989 को अपने पहले संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री बीपी सिंह ने संविधान में संशोधन करके सूचना का अधिकार कानून बनाने और शासकीय गोपनीयता अधिनियम में संशोधन करने की घोषणा की।  किंतु बी.पी.

 वर्ष 1997 में केंद्र सरकार ने एच.डी शुरी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया, मई 1997 में सूचना की स्वतंत्रता का प्रारूप प्रस्तुत किया, किन्तु शुरी कमेटी के इस प्रारूप को संयुक्त मोर्चे की दो सरकारों ने दबाया रखा।

 वर्ष 2002 में संसद ने 'सूचना की स्वतंत्रता विधेयक (फ्रिडम आफ इंफॉर्मेशन बिल) पारित किया।  इसे जनवरी 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई, लेकिन इसकी नियमावली बनाने के नाम पर यह लागू नहीं किया गया।

 संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UpA।) की सरकार ने न्युनम साझा कार्यक्रम में किए गए अपने वायदो ताहिती निर्णय युक्त शासन व्यवस्था और भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए 12 मई 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 संसद में पारित किया, जिसे 15  जून 2005 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली और अंत में 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया।  इसी के साथ सूचना की स्वतंत्रता विधेयक 2002 को रद्दस्त कर दिया गया।

 इस कानून के राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पूर्व नौ राज्यों ने पहले से लागू कर रखा था, जिसमें टीएम और गो ने 1997, कर्नाटक ने 2000, दिल्ली 2001, असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र ने 2002, और जम्मू-कश्मीर ने  2004 में लागू किए गए थे।  सूचना का तात्पर्य:

 रिकॉर्ड, दस्तावेज़, ज्ञान, ई.मेल, विचार, सलाह, राष्ट्रपतिविज्ञापन, आदेश, कवर पुस्तक, अनुबंध सहित कोई भी उपलब्ध सामग्री, निजी निकाय से संबंधित और किसी लोक प्राधिकरण द्वारा उस समय के प्रचलित कानून के अंतर्गत प्राप्त किया जा सकता है।  ।  सूचना अधिकार का अर्थ: ---------- इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बिंदु आता है-

 कार्य, दस्तावेज, रिकार्डो का निरीक्षण।

 दस्तावेज़ या रिकॉर्डो की प्रस्तावना।  सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त करें।

 सामग्री के प्रमाणित नमूने लेते हैं।

 प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लाइपी, टैप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

 सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के प्रमुख प्रावधान:

 सभी सरकारी विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र इकाई, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहे गैर सरकारी संस्थान और शिक्षण संस्थान आदि विभाग इसमें शामिल हैं।  पूर्ण तो से निजी संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं हैं लेकिन अगर कोई कानून के तहत किसी सरकारी विभाग किसी निजी संस्थान से कोई जानकारी की मांग हो सकती है तो उस विभाग के माध्यम से वह सूचना पूछी जा सकती है।

 प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए हैं, जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, स्वीकृत सूचनाओं को संपादित करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।

 जनसूचना अधिकारी की देनदारी है कि वह 30 दिन या जीवन व स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टे के अंदर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) पूछे गए सूचना उपलब्ध कराए।

 यदि जनसूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध है और या गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का भुगतान उसके वेतन में से काटा जा सकता है।  साथ ही उसे सूचना भी देनी होगी।

 लोक सूचना अधिकारी को अधिकार नहीं है कि वह सूचना मांगने का कारण नहीं पूछ सकता।

 सूचना मांगने के लिए आवेदन शुल्क देनी होगा (केंद्र सरकार ने आवेदन के साथ 10 रुपए की फीस तय की है? लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, बीपीएल कार्डधारियों को आवेदन शुल्क में सुधार प्राप्त है।

 दस्तावेजों की प्रति लेने के लिए भी फीस देनी होगी।  केंद्र सरकार ने यह फीस 2 रुपए प्रति पेज रखी है लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, अगर सूचना तय समय सीमा में उपलब्ध नहीं हुई है तो सूचना मुफ्त दी जाएगी।

 यदि कोई लोक सूचना अधिकारी यह समझता है कि पूछी गई सूचना उसके विभाग से संबंधितित नहीं है तो यह उसका कर्म है कि उस आवेदन को पांच दिन के अंदर संबंधितिट विभाग को भेजा और आवेदक को भी सूचित करें।  ऐसी स्थिति में सूचना मिलने की समय सीमा 30 की जगह 35 दिन होगी।

 लोक सूचना अधिकारी • आवेदन लेने से इंकार करता है।  या परेशान करता है।  तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है।  सूचना के अधिकार के तहत पूछा गया सूचनाओं को अस्वीकार करने, अधर्म, भ्रम में डालने वाली या गलत सूचना देने या सूचना के लिए अधिक फीस मांगने के खिलाफ केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकते हैं।

 जनसूचना अधिकारी कुछ मामलों में सूचना देने से मना कर सकते हैं।  जिन मामलों से सम्बंधित सूचना नहीं दी जा सकती है उनकी सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 में दी गई है।  लेकिन अगर पूछा गया सूचना जनहित में है तो धारा 8 में मना की गई सूचना भी दी जा सकती है।  जो सूचना संसद या विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता है उसे किसी आम आदमी को भी देने से मना नहीं किया जा सकता है।

 यदि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर संबंधितit जनसूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी  यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है।

 यदि आप पहली अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 90 दिनों के भीतर केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे संबंधितित हो) के पास होनी चाहिए।

 द्वितीय अपील के तहत केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग के आदेश से संतुष्ट न होने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।  केन्द्र में सर्वोच्च न्यायालय और राज्य में उच्च न्यायालय में आदेश के खिलाफ या आदेश के बाद भी केंद्रीय जन सूचना अधिकारी उसे मानने से इंकार करता है तो ऐसी परिस्थितियों में जा सकता है।

 विश्व के पांच देशों के सूचना के अधिकार का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए पांच देशों स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, मैक्सिको और भारत का चयन किया गया और इन देशों के कानून, लागू किए गए वर्ष, शुल्क, सूचना देने की समयावधि, अपील या शिकायतकर्ता,  जारी करने का माध्यम, प्रतिबन्धित करने का माध्यम आदि का तुलनाबनी के माध्यम से किया गया है।  देश स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, मेक्सिको, भारत के कानून कानून कानून द्वारा संविधान कानून कानून लागू वर्ष 1766, 1982, 1978, 2002, 2005 शुल्क निशुल्क निशुल्क निशुल्क निशुल्क शुल्क द्वारा सूचना देने की समयावधि तत्काल 15 दिन 1 महीने 20 दिन 1 महीने या  (जीवन व स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टा) अपील / शिकायतकर्ता न्यायालय न्यायालय सूचना आयुक्त संवैधानिक अधिकारी द नेशन कमीशन आफ ऐक्सेस टू पब्लिक इन्फार्मरमेशन विभागीय स्तर पर प्रथम अपीलीय अधिकारी या सूचना आयुक्त (मुख्य सूचना आयुक्त केन्द्रीय या राज्य स्तर पर)।

 जारी करने का माध्यम कोई भी कोई भी किसी भी रूप में इलेक्ट्रानिक रूप में सार्वजनिक आफलाइन और आनलाइन प्रति प्रबंध किए गए सूचना गोपनीयता और सार्वजनिक रिकॉर्ड एक्ट 2002 सुरक्षा और अन्य देशों से संबंधित सूचना सूचना अधिकारियों से संपर्क करें।  , आंतरिक व बाहरी सुरक्षा और अधिनियम की धारा 8 से संबंधित सूचना।

 विश्व में पांच देश स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, मेक्सिको और भारत के सूचना का अधिकार कानून का तुलनात्मक अध्ययन निम्नलिखित बडुओं के अन्तर्गत है।

 विश्व में सबसे पहले स्वीडन ने सूचना का अधिकार कानून 1766 में लागू किया, जबकि कनाडा ने 1982, फ्रांस ने 1978, मेक्सिको ने 2002 और भारत ने 2005 में लागू किया।

 विश्व में स्वीडन पहला ऐसा देश है, जिसके संविधान में सूचना की स्वतंत्रता प्रदान की है, इस मामले में कनाडा, फ्रांस, मेक्सिको और भारत क संविधान उतनी स्वतंत्र रूप से प्रदान नहीं करता है।  जबकि स्वीडन के इंक ने 250 वर्ष पूर्व सूचना की स्वतंत्रता की वकालत की है।

 सूचना मांगन वाले को सूचना प्रदान करने की प्रक्रिया स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, मेक्सिको और भारत में अलग-अलग है जिसमें स्वीडन सूचना मांगने वाले को तत्काल और निशल्क सूचना देने का प्रावधान है।

 सूचना प्रदान करने के लिए फ्रांस और भारत में 1 महीने का समय निर्धारित किया गया है, हालांकि भारत ने जीवन और स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टे का समय दिया गया है, लेकिन स्वीडन अपने नागरिकों को तत्काल सूचना उपलब्ध कराने के लिए है, जबकि कनाडा 15 दिन और  मेक्सिको 20 दिन में सूचना प्रदान कर रहा है।

 सूचना न मिलने पर अपील प्रक्रिया भी लगभग एक ही समान है।

 स्वीडन में सूचना न मिलने पर न्यायालय में जाता है।  कनाडा और भारत में सूचना की पुष्टि की गई, जबकि फ्रांस में संवैधानिक अधिकारी और मेक्सिको में 'डी नेशनल आंसर एक्सेस टू पब्लिक इनफाॅर्मेशन' की अपील और अध्यादेश का निपटारा करता है।

 स्वीडन किसी भी माध्यम द्वारा तत्काल सूचना उपलब्ध उपलब्ध है जिसमें वेबसाइट पर भी सूचना जारी की जाती है।  कनाडा और फ्रांस अपने नागरिकों को किसी भी रूप में सूचना दे सकता है, जबकि मेक्सिको इलेक्ट्राोनिक रूप से सूचनाओं का जनता करता है और भारत के प्रति व्यक्ति को सूचना उपलब्ध है।

 गोपनीयता के मामले में स्वीडन ने गोपनीयता और सार्वजनिक रिकॉर्ड एक्ट 2002, कनाडा ने सुरक्षा और अन्य देशों से संबंधित सूचनाओं को संशोधित किया है।  उल्लिखित प्रावधानों से संबंधित सूचनाओं को देने पर रोक है।

 सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019

 हाल ही में लोकसभा ने सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 [सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019] पारित किया है।  इस विधेयक में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को संशोधित करने का प्रस्ताव किया गया है।

 संशोधन के प्रमुख बिंदु: दाखिल करना

 सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त [मृत सूचनाओं] (मुख्य सूचना आयुक्त) और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है, लेकिन संशोधन के तहत इसे संशोधित करने का प्रावधान किया गया है।  प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

 नए विधेयक के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और अन्य दैनिक पाठ्यक्रम की देन भी केंद्र सरकार द्वारा ही तय की जाएगी।

 सूचना का अधिकार अधिनियम 2005  , लेकिन इस नए संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।

 निष्कर्ष-

 सूचना का अधिकार कानून आज विश्व के 80 से देशों के लोकतंत्र की शोभा बढ़ा रहा है।  जिन देशों ने सूचना के अधिकार को महता दी है, उनमें उनसे स्वीडन को भूलाया नहीं जा सकता है।  अगर साफ शब्दों में कहा जाए तो स्वीडन सूचना अधिकार कानून की जननी है, उसके साथ महान स्वीडन का संविधान है, जिसने पूरी दुनिया में पुरानी संविधान होने का दावा किया, जिसमें सूचना का अधिकार को अपने मूल्यन समेटे हुए लोकतंत्र को परिभाषित किया गया है।  अन्य देशों ने जहां सूचना देने के लिए समयसीमा निर्धारित कर रखी है, वहीं स्वीडन ने सूचना तत्काल और निशुल्क दिए जाने की पैरवी की।]  मेक्सिको ने जहां खुद ही अपने नगारिको को सूचना लेने और सरकार को सूचना स्वचालित प्रकाशित करने का निर्देश दिया है, जिसने लोगो का आज़ादी का एक नया पंख लगा दिया है।  स्वचालित सूचना जारी करने का निर्देश तो भारत की सरकार ने भी दिया है, लेकिन किसी भी राज्य और केंद्र के विभाग ने इसकी कोई पहल नहीं की है।  भारत में लोक सेवको, राजनेताओं और नौकरशाहोे ने इस कानून को बकवास कहकर बंद करने की मांग उठाई है।  स्वयं पूर्व प्रधान डा 0 मनमोहन सिंह ने इस कानून के दायरे को कम करने और संज्ञा बढ़ाने की वकालत की है।  भारत में इसकी स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि खुद सरकार ही इस कानून को लेकर गम्भीर नहीं नज़र आती है।  वर्तमान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 'आरटीआई किसी को खाने के लिए नहीं देता' के ऐसे बयानों से सरकार की मंशा जग जाहिर हो गई है।  सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भी निष्पक्षता से नहीं किया जाता है।  पूर्व नौकरशाहों और अपने चहेतो को इस कानून का मुहाफिज़ के रूप में सूचना आयुक्त बनना भ्रष्टाचार और दोहरी नीति का उदाहरण है।  भ्रष्टाचार की मुखालिफत और विस्तार के हामी भरने वाले सियासी लोग और सियासी दल आरटीआई के दायरे में आने का विरोध कर चुके हैं और सत्ताधारी व विपक्षी दल सभी मिलकर एकजुट कर इस कानून के दायरे में न आने के लिए एक मंच पर नज़र आते हैं।

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