Friday, April 23, 2021

भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिंदी सहित्य प्रसिद्ध लेखक तथा कवि का जीवन परिचय bhaaratendu harishchandr hindee sahity prasiddh lekhak tatha kavi ka jeevan parichay

💐❣ भारतेन्दु हरिश्चंद्र 💐
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
जन्मकाल – 9 सितम्बर 1850 ई. (1907 वि.) काशी (एक सम्पन्न वैश्य परिवार में )
मृत्युकाल – 6 जनवरी 1885 ई. (1942 वि.)
नोट:- मात्र 35 वर्ष की अल्पायु में इनका निधन हो गया था।

पिता का नाम – बाबू गोपालचन्द्र गिरिधरदास (ये इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद की वंश परम्परा में उत्पन्न हुए माने जाते हैं।)

मूल नाम – हरिश्चन्द्र
उपाधि – भारतेन्दु
नोट:- डाॅ. नगेन्द्र के अनुसार उस समय के पत्रकारों एवं साहित्यकारों ने 1880 ई. में  इन्हें ’भारतेंदु’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

मुख्य व्यवसाय – पत्रकारिता
⇒ सम्पादन कार्य – इनके द्वारा निम्नलिखित तीन पत्रिकाओं का सम्पादन कार्य किया गया था –

1. कवि-वचन सुधा – 1868 ई. (मासिक, पाक्षिक, साप्ताहिक)
2. हरिश्चन्द्र चन्द्रिका – 1873 ई. (मासिक)
नोट:- शुरुआती आठ अंकों तक यह पत्रिका ’हरिश्चन्द्र मैगजीन’ नाम से प्रकाशित हुई थी। नवें अंक में इसका नाम ’हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ रखा गया था। हिन्दी गद्य का ठीक परिष्कृत रूप सर्वप्रथम इसी ’चन्द्रिका’ में  प्रकट हुआ।

3. बाल-बोधिनी – 1874 ई. (मासिक)

नोट:- ये तीनों पत्रिकाएँ ’काशी/बनारस’ से प्रकाशित होती थी।

प्रमुख रचनाएँ – अपने पैंतीस वर्ष के अल्पकालिक जीवन में  भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के द्वारा हिन्दी साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा पर अपनी लेखनी चलायी गयी है, जिसके लिए हिन्दी साहित्य जगत् सदैव उनका ऋणी (आभारी) रहेगा।
(इनकी समस्त रचनाओं की संख्या 175 के लगभग है।)

1. नाट्य रचनाएँ – भारतेंदु जी के द्वारा अनूदित एवं मौलिक सब मिलाकर कुल 17 (सत्रह) नाटक लिखे गये थे। जिनमें से आठ अनूदित एवं नौ मौलिक नाटक माने जाते हैं।
अनूदित नाटकों की ट्रिक्स -
विद्या रत्न है पाखण्ड धन
कपूर है, पर दुर्लभ है भारतजन में मुद्रा ।

(क) अनूदित नाटक – आठ
(।) विद्यासुंदर – 1868 ई. – यह संस्कृत नाटक ’’चौर पंचाशिका’’ के बंगला संस्करण का हिन्दी अनुवाद है।

(2) रत्नावली – 1868 ई. – यह संस्कृत नाटिका ’रत्नावली’ का हिन्दी अनुवाद है।

(3 ) पाखंड-विखंडन – 1872 ई.- यह संस्कृत में ’कृष्णमिश्र’ द्वारा रचित ’प्रबोधचन्द्रोदय’ नाटक के तीसरे अंक का अनुवाद है।

(4) धनंजय विजय – 1873 ई.- यह संस्कृत के ’कांचन’ कवि द्वारा रचित ’धनंजय विजय’ नाटक का हिन्दी अनुवाद है।

(5) कर्पूरमंजरी – 1875 ई. – यह ’सट्टक’ श्रेणी का नाटक संस्कृत के ’कांचन’ कवि द्वारा रचित नाटक का अनुवाद है।

(6) भारत जननी – 1877 ई. – यह इनका गीतिनाट्य है जो संस्कृत से हिन्दी में अनूदित है।

(7) मुद्राराक्षस – 1878 ई. – यह विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का हिन्दी अनुवाद है।

(8) दुर्लभबंधु – 1880 ई. – यह अंग्रेजी नाटककार ’शेक्सपियर’ के मर्चेंट ऑव वेनिस’ का हिन्दी अनुवाद है।

(ख) मौलिक नाटक – (नौ)
(1) वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति – 1873 ई. – प्रहसन – इसमें पशुबलि प्रथा का विरोध किया गया है।

(2 ) सत्य हरिश्चन्द्र – 1875 ई. – इसमें असत्य पर सत्य की विजय का वर्णन किया गया है।

(3 ) श्री चन्द्रावली नाटिका – 1876 ई. – इसमें प्रेम भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।

(4) विषस्य विषमौषधर्म – 1876 ई. -भाण – यह देशी राजाओं की कुचक्रपूर्ण परिस्थिति दिखाने के लिए रचा गया था।

(5) भारतदुर्दशा – 1880 ई. -नाट्यरासक
– इसमें अंगे्रजी राज्य  में भारत की दशा का चित्रण किया गया है। यह नाटक ’प्रबोध-चन्द्रोदय’ की प्रतीकात्मक शैली से प्रभावित है।

(6) नीलदेवी – 1881 ई. – गीतिरूपक
– यह पंजाब के एक हिन्दू राजा पर मुसलमानों की चढ़ाई का ऐतिहासिक वृत्त लेकर लिखा गया है। इसमें भारतीय नारी के आदर्शों की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।

(7) अंधेर नगरी – 1881 ई. – प्रहसन (छह दृश्य) इसमें भ्रष्ट शासन तंत्र पर व्यंग्य किया गया है।

(8) प्रेम जोगिनी – 1875 ई. – नाटिका
– इसमें तीर्थस्थानों पर होने वाले कुकृत्यों का चित्रण किया गया है।

(9) सती प्रताप – 1883 ई. – गीतिरूपक
– यह इनका ’अधूरा नाटक’ माना जाता है। इस नाटक को बाद में ’राधाकृष्णदास’ द्वारा पूरा किया गया था।

⇒ काव्यात्मक रचनाएँ
-इनके द्वारा रचित काव्य रचनाओं की कुल संख्या 70 मानी जाती हैं, जिनमें से कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ निम्नानुसार हैं –
प्रेम प्रलाप
बकरी विलाप
प्रबोधिनी
दैन्य प्रलाप
विजय-वल्लरी-1881
विजयिनी विजय वैजयंती-1882
दशरथ विलाप
प्रातःसमीरन
वैशाख माहात्म्य
रिपनाष्टक
वर्षा-विनोद-1880
फूलों का गुच्छा-1882
भक्त सर्वस्व
उर्दू का स्यापा
बन्दरसभा
नोट:- 1. इनकी ’प्रबोधिनी’ रचना विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की प्रत्यक्ष प्रेरणा देने वाली रचना है।
2. ’दशरथ विलाप’ एवं ’फूलों का गुच्छा’ रचनाओं में ’ब्रज’ के स्थान पर ’खङी बोली हिन्दी’ का प्रयोग किया है।
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
Hindi_Sahitya ❣💐
StudyforHindiSahitya

No comments: