Sunday, April 18, 2021

Bhagwan parsvnath jain jain dharam ke 23rd tirthnkar भगवान पार्श्वनाथ तेइसवें तीर्थंकर प्रभुजी





पार्श्वनाथ तेइसवें तीर्थंकर प्रभुजी


भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें (23 वें) तीर्थंकर हैं।  जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अधर्मी भाग, मृदपुरी आयाम है और इसके चौथे युग में २४ तीर्थंकरों का जन्म हुआ था।

 पार्श्व नाथ की शिक्षाएँ: -

 सदा सत्य बोलना
 चोरी ना करना
 संपत्ति को न लेना
 हिंसा न करना
 आत्म संयम

 जन्म और पूर्व जीवनकाल और आयु

 तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था।  कनसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय राजा थे।  उनकी रानी वामा ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन महातेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसके शरीर पर सर्पचिह्नमुर्ग था।  वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम 'पार्श्व' रखा गया।  उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ।  एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री के लिए एक ओर जा रहे हैं।  वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहाँ पंचाग्नि जला रहा है, और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा- 'दयाहीन' धर्म किसी काम का नहीं '।

 वैराग्य और दीक्षा

 तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने तीस वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैनेश्वरी दीक्षा ली थी और ब्रह्मचारी अविवाहित।

 केवल ज्ञान 

 काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84 वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था।  पुंड़्र, तामश्रित आदि कई देशों में उन्होंने भ्रमण किया।  तामसिक रूप से दाद हुए।  पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की, जिसमें मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरूप में है।  प्रत्येक गण एक गणधर के अन्तर्गत कार्य करता था।  सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था।  सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है।  यहीं पर जैन धर्म के 11 वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था।

 केवल ज्ञान के पश्चात तीर्थंकर पार्शवनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत - सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।

 

 अंत में अपना निर्वाणकाल समीप जानकर श्री सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ की पहाड़ी जो झारखंड में है) पर चले गए जहाँ श्रावण शुक्ला अष्टमी को उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुई।  भगवान पार्श्वनाथ की लोकव्यापत्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिह्नों में पार्श्वनाथ का चिह्न सबसे ज्यादा है।  आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियाँ देश भर में विराजित है।  जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं।  ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध के अधिकांश पूर्वज भी पार्श्वनाथ धर्म के अनुयायी थे।]

 पूर्वजन्म 

 जैन ग्रंथों में तीर्थंकर पारसवनाथ को नौ पूर्व जन्मों का वर्णन हैं।  पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पाँचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) तत्पश्चात दसवें जन्म में  उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलत: वे तीर्थंकर बने

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