Tuesday, April 27, 2021

महान वीर विनायक दामोदर सावरकर जी के बारे में रोचक तथ्य Interesting facts about the great Veer Vinayak Damodar Savarkar

╰⍆☞'रोचक तथ्य'☜┼╯:
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➨आइये आज जानते हैं विनायक दामोदर सावरकर जी के बारे में महत्वपूर्ण रोचक तथ्य और इतिहास...

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पूरा नाम-विनायक दामोदर सावरकर

अन्य नाम-वीर सावरकर

जन्म-28 मई, 1883

जन्म भूमि-भगूर गाँव, नासिक, भारत

मृत्यु-26 फ़रवरी, 1966

मृत्यु स्थान-मुम्बई, भारत

अभिभावक-दामोदर सावरकर और राधाबाई सावरकर

पति/पत्नी- यमुनाबाई

संतान पुत्र- प्रभाकर, विश्वास सावरकर,

पुत्री- प्रभात चिपलूनकर

नागरिकता-भारतीय

प्रसिद्धि-हिन्दुत्व

धर्म-हिन्दू

आंदोलन-भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन
जेल यात्रा-1911 से 1921 तक (दस वर्ष)

विद्यालय-शिवाजी हाईस्कूल, नासिक, फ़र्ग्युसन कॉलेज, पुणे

शिक्षा-स्नातक, वकालत

राजनीतिक पार्टी-अखिल भारत हिन्दू महासभा

रचनाएँ-भारतीय स्वातंत्र्य युद्ध, मेरा आजीवन कारावास, अण्डमान की प्रतिध्वनियाँ, हिंदुत्व, द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस-1857

🔜विनायक दामोदर सावरकर जन्म- 28 मई, 1883, भगूर गाँव, नासिक; मृत्यु- 26 फ़रवरी, 1966, मुम्बई, भारत) न सिर्फ़ एक क्रांतिकारी थे बल्कि एक भाषाविद, बुद्धिवादी, कवि, अप्रतिम क्रांतिकारी, दृढ राजनेता, समर्पित समाज सुधारक, दार्शनिक, द्रष्टा, महान् कवि और महान् इतिहासकार और ओजस्वी आदि वक्ता भी थे। उनके इन्हीं गुणों ने महानतम लोगों की श्रेणी में उच्च पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया।

 ✅️"जन्म:-वीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले विनायक दामोदर सावरकर साधारणतया वीर सावरकर के नाम से विख्यात थे। वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भगूर गाँव में हुआ। उनके पिता दामोदरपंत गाँव के प्रतिष्‍ठित व्यक्तियों में जाने जाते थे। जब विनायक नौ साल के थे तभी उनकी माता राधाबाई का देहांत हो गया था। विनायक दामोदर सावरकर, 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी थे। उन्हें हिन्दू शब्द से बेहद लगाव था। वह कहते थे कि उन्हें स्वातन्त्रय वीर की जगह हिन्दू संगठक कहा जाए। उन्होंने जीवन भर हिन्दू हिन्दी हिन्दुस्तान के लिए कार्य किया। वह अखिल भारत हिन्दू महासभा के 6 बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। 1937 में वे 'हिन्दू महासभा' के अध्यक्ष चुने गए और 1938 में हिन्दू महासभा को राजनीतिक दल घोषित किया था। 1943 के बाद दादर, मुंबई में रहे। बाद में वे निर्दोष सिद्ध हुए और उन्होंने राजनीति से सन्न्यास ले लिया।

🔜“वीर सावरकर की देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत है”
 
भारत में अन्य विचारधाराओं पर राष्ट्रवाद के हावी होने के साथ जहां एक ओर विनायक दामोदर सावरकर पर विषयवार चर्चा बढ़ी है। वहीं, इस स्वरुप के विरोधी अक्सर सावरकर के योगदानों को कम  करके आंकते हैं।

ऐतिहासिक तथ्यों का सुविधानुसार उपयोग इस लड़ाई को और भी हवा देता है। ऐसे में सावरकर और भगत सिंह की तुलना करने से भी लोग बाज़ नहीं आते। इस क्रम में सावरकर द्वारा उनके माफीनामे को घिनौना माना  जाता है। एक आम नागरिक के रूप में राष्ट्रीय महापुरुषों के ऊपर ऐसी टिप्पणी कभी-कभी असहनीय हो जाती है।

🔜 लंदन से की क्रांति की शुरुआत 

:-सावरकर से जुड़ी घटनाओं पर नज़र डालें तो सर्वप्रथम जो पांच वर्ष उन्होंने कानून के छात्र के रूप में लंदन में बिताए उसी बीच उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलन कर ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की। उन्होंने भारत से यूरोप, यहां तक कि अमेरिका में भी समान सोच के लोगों का एक नेटवर्क तैयार किया। इसके साथ ही उन्होंने आयरलैंड, फ्रांस, इटली, रूस और अमेरिकन नेताओं, क्रांतिकारियों और पत्रकारों के साथ वैचारिक संबंध कायम किए।

इसमें कोई शक नहीं है कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सबसे खतरनाक राजद्रोही के रूप में दर्शाया। सावरकर लंदन में पढ़ रहे थे इसलिए 1881 का भगोड़ा अपराधी अधिनियम उन पर लागू नहीं होता था जिसके कारण उन्हें भारत भेजते हुए यह भी सुनिश्चित किया गया कि सावरकर को अपना बचाव या अपील करने का मौका ना मिले। यहां पर उन्हें कुल 50 साल की सज़ा दी गई। उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर के साथ उन्हें अंडमान के सेल्लुलर जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया।


🔜ब्रिटिश सरकार ने दी दो जन्मों की सज़ा

:-उन्हें दो जन्मों की कैद दी गई वो भी तब जब ब्रिटिश इसाई धर्म में मानते थे और दूसरे जन्म में उनका विश्वास नहीं था। ब्रिटिश दस्तावेज़ बताते हैं कि वे सावरकर की उपस्थिति से इतने डरे हुए थे कि उन्हें जल्द से जल्द भारत की मुख्य भूमि से दूर रखने का प्रयास किया गया।

सेल्लुलर जेल में उन्हें हर संभव यातना से गुजरना पड़ा। ज़ंजीरों से बांध कर उल्टा लटकाना, मील में बैलों की तरह बांध कर कोल्हू खिंचवाना, इसके बाद हर ज़रुरी सुविधा जैसे कि टॉयलेट और पानी से दूर रखना, सड़ा हुआ खाना देना बल्कि खाने में मक्खी और जोंक के टुकड़े देना ये सब उनको दी जाने वाली यातनाओं का हिस्सा था।

1913 में सावरकर ने दूसरे कैदियों के साथ मिल कर अमानवीय व्यवहार के खिलाफ जेल में भूख हड़ताल और असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट लीक हुई कि सावरकर अपने साथियों के साथ मिल कर जेल में ही बम बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। बात ऊपर तक गई तो अक्टूबर 1913 में भारत सरकार के गृह सदस्य ‘सर रेगीनाल्ड एच. क्रेद्दोक’ ने सेल्लुलर जेल जाने का फैसला किया और कुछ राजनीतिक कैदियों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनी।

सावरकर और दूसरे राजनीतिक कैदी जैसे बारिन घोष, नन्द गोपाल, हृषिकेश कांजीलाल और सुधीर कुमार से बातचीत की गई और फिर उन सभी ने याचिकाएं भी जमा की। यह प्रक्रिया ब्रिटिश भारत में सभी राजनीतिक कैदियों के लिए वैध थी। ठीक वैसे ही जैसे उन्हें कोर्ट में अपने वकील के माध्यम से अपने बचाव का मौका मिलता था। कानूनी शिक्षा प्राप्त करने के कारण सावरकर को इसकी अच्छी जानकारी थी और इसलिए उन्होंने अपने आप को स्वतंत्र कराने या जेल में अपनी स्थिति बेहतर करवाने के लिए हर प्रावधानों का उपयोग करना चाहा।

सावरकर दूसरे कैदियों को भी अक्सर समझाया करते थे कि क्रांतिकारियों का प्राथमिक कर्तव्य खुद को अंग्रेज़ों के चंगुल से छुड़ाना था जिससे कि वे मातृभूमि की सेवा करने में फिर से जुट सके।

🔜1913 में सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को सौंपी याचिका

14 नवंबर 1913 को क्रेद्दोक को सौंपी अपनी याचिका में सावरकर ने तर्क दिया कि बलात्कार, मर्डर, चोरी और दूसरे अपराधों में सज़ा पाए आम अभियुक्तों को तो उनके अच्छे व्यवहार के आधार पर सहूलियतें दी जाती थी या 6 – 18 महीने के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता था लेकिन ‘विशेष श्रेणी का कैदी’ होने के बावजूद उनके लिए ये प्रावधान उपलब्ध नहीं थे। यहां तक कि अच्छे भोजन और बर्ताव की मांग पर उन्हें यह कहते हुए इंकार कर दिया गया कि वो एक ‘सामान्य दोषी’ हैं। वह यदि किसी अन्य भारतीय जेल में होते तो यह सब आसानी से हासिल किया जा सकता था पर सेल्लुलर जेल में वह साल में एक से अधिक चिठ्ठी भी नहीं  भेज सकते थे और ना ही अपने परिवार वालों से मिल सकते थे।

1909 के मोर्ले – मिन्टो सुधार के तहत भारतीयों को सरकार और शिक्षा में भाग लेने के बेहतर अवसर प्राप्त हुए थे। इसे ध्यान में रखते हुए सावरकर ने अपनी याचिका में यह ज़ोर देकर कहा कि उन्हें अब बंदूक उठाने की ज़रूरत नहीं रह गई थी और मुख्य धारा की राजनीति में जुड़ कर और सरकार के साथ मिल कर काम कर भारतीयों के लिए बेहतर संवैधानिक भागीदारी को पूर्ण करने में ही उनकी खुशी थी।

🔜”मैं किसी प्रकार की विशेष सुविधा नहीं मांग रहा,” उन्होंने कहा, “पर राजनीतिक कैदी होने के नाते मेरा विश्वास है कि विश्व के किसी स्वतंत्र राष्ट्र  में सभ्य प्रशासन इतना तो कर ही सकता है। इतना नहीं तो केवल वो रियायत और एहसान जो सबसे कुख्यात और इरादातन अपराधियों को दिया जाता है?” यह पूर्णरूप से अंग्रेज़ों के असभ्य होने का अप्रत्यक्ष मज़ाक उड़ाने जैसा था।

दुर्भाग्य से सावरकर को उनकी याचिका के लिए दुत्कारने वाले वही मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो कसाब, याकूब मेमन, नक्सली और उनके वैचारिक सिरमोरों की पैरवी करते फिरते हैं।

याचिका की अंतिम पंक्ति जो विवाद को निमंत्रण देती है उसकी भी व्याख्या किसी से छुपी नहीं है, ”जो शक्तिशाली होता है वह दयालु होने का जोखिम उठा सकता है और कहां कोई उदार माई का लाल लौट कर आया हो फिर सरकार को माई बाप मानने को रुका है?” यह संदर्भ बाइबल से लिया गया था। यह कहना ठीक ही होगा कि वह जेलर की धार्मिक भावनाओं को भड़का रहे थे। इस याचिका की केवल कुछ पंक्तियों को उनके पूर्ण रूप या संदर्भ के बिना देखना बौद्धिक मूर्खता है।

मज़ेदार बात यह है कि भारत से वापस लौटते हुए क्रेद्दोक ने जहाज़ पर ही लिखे अपने रिपोर्ट में कहा कि सावरकर ने जो भी किया उसके लिए उसे कोई पछतावा व्यक्त करने के लिए नहीं कहा जा सकता। आगे उन्होंने लिखा, “सावरकर काफी महत्वपूर्ण नेता है जिसे भगाने के लिए भारतीय अराजक तत्वों का यूरोपीय धरा लंबे समय से प्रयत्न कर रहा है। यदि उसे सेल्लुलर जेल से बाहर कहीं भी कैद किया जाएगा तो वह फरार होने में कामयाब हो जाएगा। उसके दोस्त आराम से किसी भी द्वीप पर स्टीमर से पहुंच कर और थोड़े पैसे बांट कर ऐसा करने में सफल रहेंगे। निस्संदेह सरकार ने याचिका ख़ारिज कर दी और सावरकर के लिए कुछ नहीं बदला।”

🔜प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही 1914 में दी दूसरी याचिका

प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही सावरकर ने अक्टूबर 1914 में दूसरी याचिका दी जिसमें उन्होंने युद्ध में भारत सरकार की किसी प्रकार से सेवा करने का प्रस्ताव दिया। उसी याचिका में उन्होंने उन सभी कैदियों के सामान्य रिहाई की गुहार लगाई जिन्हें किसी राजनीतिक घटना के कारण सज़ा मिली थी। ऐसा कई ब्रिटिश उपनिवेश में किया जाता रहा था।

मज़ेदार बात यह है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने इस महत्वपूर्ण समय में ब्रिटेन को खुला समर्थन दिया था। जब युद्ध चल रहा था तब महात्मा गाँधी ब्रिटेन में ही थे जहां उन्होंने एक चिकित्सीय सेना भी बनाई। यह उसी तरह की थी जैसा उन्होंने बोअर युद्ध (दक्षिण अफ़्रीकी युद्ध) के वक्त ब्रिटेन की मदद करने के लिए बनाया था और यहां तक कि इसके लिए उन्होंने गोल्ड मेडल भी जीता।

22 सितम्बर 1914 को जारी एक विज्ञप्ति में गाँधी जी को फिल्ड अम्बुलेंस ट्रेनिंग पुलिस के लिए भी बुलाया गया था। जनवरी 1915 में वह जब भारत वापस आए तो उन्होंने युद्ध में ब्रिटेन को बिना किसी शर्त के समर्थन दिया क्योंकि गाँधी जी को लगता था कि ब्रिटेन अभी मुश्किल परिस्थितियों में है इसलिए ब्रिटेन को शर्मिंदा होने के लिए छोड़ देना या भारत की आज़ादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना ठीक नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि इंग्लैंड की ज़रूरत हमारे लिए एक मौका नहीं बनना चाहिए और फिर हमारे द्वारा लंबे समय से की जा रही मांगों को भी युद्ध के अंत में पूरा किया जाएगा। गुजरात के गांव – गांव में घूमते हुए उन्होंने युद्ध में भाग लेने के लिए सैनिकों की नियुक्ति में अंग्रेज़ों की मदद की। उस वक्त दक्षिण भारत के गांवों में सैनिक बनाने के लिए लोगों का अपहरण तक कर लिया जाता था। गाँधी जी या कांग्रेस ने कभी इसका विरोध नहीं किया। ये सब सावरकर के 1914 वाले याचिका से कितना अलग था?

🔜1917 में दी तीसरी याचिका

5 अक्टूबर 1917 को राज्य सचिव ‘एडविन शमूएल मोंटागु’ को दिए याचिका में सावरकर ने मोंटागु – चेल्म्फोर्ड सुधार का हवाला देते हुए ब्रिटेन को सीमित स्वशासन और भारतीयों के लिए दो सदनात्मक विधानसभा बनाने की बात को याद दिलाया। ये मांगें विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों के समर्थन के बदले किए गए थे। उन्होंने भारत में होम रुल और भारत को कॉमनवेल्थ का स्वतंत्र साथी बनाने की मज़बूती से वकालत की पर अंग्रेज़ों ने संवैधानिक आंदोलन ना होने का बहाना बनाया।

सावरकर ने कहा कि जब देश में कोई संविधान ही नहीं था तो संवैधानिक आंदोलन कैसे किया जा सकता था? यदि वास्तव में तब कोई संविधान अस्तित्व में लाना हो तो इसके लिए काफी सारा राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक कार्य करने की ज़रूरत थी लेकिन यह तभी किया जा सकता था जब सभी राजनीतिक कैदियों को संतुष्ट किया जाए कि उन्हें बिना कारण जेल में बंद कर दंड नहीं दिया जाएगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला दिया जैसे कि रूस, फ्रांस, आयरलैंड और ऑस्ट्रिया मे कैदियों की सज़ा माफ करना एक आम प्रक्रिया बन गई थी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस याचिका में उन्होंने विशेष रूप से कहा, “यदि सरकार को लगता है कि इससे सिर्फ मेरे ज़मानत पर ही असर पड़ेगा तो मुझे कैद में ही रखा जाए या यदि मेरा नाम एक बड़ी रुकावट बन रहा है तो मेरा नाम लिस्ट से मिटा दिया जाए और दूसरे सभी कैदियों को छोड़ दिया जाए। इससे मुझे उतनी ही संतुष्टि मिलेगी जितनी कि मेरी रिहाई पर मुझे मिलती।”


🔜युद्ध के बाद सावरकर के अलावा सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ दिया गया

युद्ध की समाप्ती के साथ ही राजा जॉर्ज पंचम के शाही फरमान के कारण पूरे भारत और अंडमान के सारे राजनीतिक कैदियों को इकट्ठे छोड़ा जाने लगा। बारिन घोस, त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती, हेमचन्द्र दास, सचिन्द्र नाथ सान्याल परमानन्द सहित सेल्लुलर जेल के राजनीतिक कैदियों को एक निश्चित समय तक राजनीति में ना आने की प्रतिज्ञा पर छोड़ दिया गया।

इसी तर्ज पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी छोड़ दिया गया जिन्हें 1919 के असहयोग आंदोलन के वक्त गिरफ्तार किया गया था जबकि इस तरह का कोई भी फायदा सावरकर और उनके बड़े भाई को नहीं मिला।

सावरकर ने उसी समय फिर से याचिका दायर की लेकिन अंग्रेज़ों ने उन्हें फिर भी जेल में ही रखा क्योंकि उन्हें डर था कि सावरकर के बाहर आने के बाद ‘अभिनव भारत’ का नेतृत्व उनके हाथ में चला जाएगा जो एक बार फिर से क्रांतिकारी आंदोलन भड़का सकता था। 

🔜 इसलिए 20 मार्च 1920 के दिन सावरकर ने अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ एक बार फिर से याचिका दायर की।

1921 में जब सेल्लुलर जेल बंद होने को आया तो अंग्रेज़ों ने मई 1921 में सावरकर को रत्नागिरी जेल भेजने का फैसला लिया। उस समय तक सावरकर ने पोर्ट ब्लेयर जेल में ही अच्छा खासा सुधार कर लिया था जैसे कि पुस्तकालय की स्थापना, सज़ा पाए लोगों के लिए शिक्षा की व्यवस्था और किसी प्रकार के दवाब के कारण धर्म परिवर्तन की समाप्ति।

आगे समस्या फिर से बढ़ गई क्योंकि रत्नागिरी जेल में इन सारी सुविधाओं को उनसे छीन लिया गया। इस तरह वह वहीं पहुंच गए जहां से सज़ा की शुरुआत हुई थी। सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘माय ट्रांसपोर्टेशन ऑफ लाइफ’ में बताया कि उस वक्त उन्होंने तीसरी बार आत्महत्या करने का फैसला किया। ऐसा फैसला उन्होंने पहले 2 बार सेल्लुलर जेल में किया था।

उनका असीम आत्मबल ही था कि वो इस तरह के विचारों से बाहर आ सके अन्यथा कितने राजनीतिक कैदियों ने अपने आप को फांसी से लटका लिया था और कितने पागल हो गए थे। ऐसी स्थिति में 19 अगस्त 1921 को दी गई उनकी याचिका उनके टूटे हुए मन और निराशा को दर्शाती है जिसके कारण उन्होंने राजनीति को त्यागने का फैसला लिया।

🔜1924 में सावरकर को रिहा किया गया

3 साल बाद 6 जनवरी 1924 को वह समय आ गया जब सावरकर को जेल से छोड़ दिया गया लेकिन रत्नागिरी जिले के भीतर ही सख्त निगरानी रख उन्हें राजनीति से वंचित रखा गया। उन्होंने अपने जीवन के अगले 13 साल इसी प्रकार बिताए पर उन्होंने सामाजिक सुधार के उन कार्यक्रमों को जारी रखा जिससे जाति प्रथा और छुआछुत को समाप्त किया जा सके।

हरिजन आंदोलन और अंबेडकर के आवाहन के काफी पहले ही सावरकर ने अंतर-जातीय भोज की शुरुआत कर दी थी। इसके अलावा उन्होंने रत्नागिरी में पतीत – पवन मंदिर का निर्माण करवाया जिसमें सभी जातियों के लोग पूजा करते थे।

🔜ऐसा कोई भी विश्लेषण जो सावरकर या उनके जैसे किसी भी वीर की छवि को धूमिल करता हो उसे कठिन प्रश्नों से गुज़ारने की ज़रूरत है।

हमें यह देखना होगा कि काँग्रेस द्वारा किए गए आंदोलन से परेशान होकर अंग्रेज़ों ने भारत छोड़ने का फैसला किया या फिर दूसरे विश्व-युद्ध के बाद उनकी स्थिति बदतर हो गई थी। ब्रिटेन को हर उस भारतीय से डर लगता था जिसकी दोस्ती दूसरे देश के नेताओं से थी।

दूसरे विश्व युद्ध के वक्त भी काँग्रेस ने भारत को आज़ादी देने की शर्त पर ब्रिटेन को समर्थन देने की बात कही थी। मुस्लिम लीग ने तो ब्रिटेन का समर्थन भी किया था। काँग्रेस भी ऐसा कर सकती थी पर उस वक्त तक सुभाष चन्द्र बोस का प्रभाव बढ़ गया था।

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➨"महान वीर सावरकर जी के बारे में रोचक तथ्य"

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 वीर सावरकर Veer Savarkar पहले क्रांतिकारी ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और उन्होंने कहा कि वो हमारे देश की नहीं बल्कि शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष की मृत्यु पर ब्रिटेन में कभी शोक सभा हुई है?

☞"वीर सावरकर Veer Savarkar पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह के उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ।

☞"वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली इसलिए उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया।

☞"विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर Veer Savarkar ने जलाई थी |

☞"वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी |

☞"वीर सावरकर Veer Savarkar पहले ऐसे देशभक्त लेखक थे जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध ban लगा रहा |

☞"वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक writer थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि-‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका.पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः’ अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है |

☞"वीर सावरकर पहले ऐसे क्रान्तिकारी व्यक्ति थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय 8 जुलाई 1910 को समुद्र में कूद गए थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे |

☞"सावरकर Veer Savarkar पहले क्रान्तिकारी व्यक्ति थे जिनका मुकदमा अंतरास्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस आपस मे मिले होने के कारण सावरकर को न्याय नही मिला सका और उन्हें बंदी बनाकर भारत लाया गया |

☞"वीर सावरकर Veer Savarkar विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी |

☞"सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले- “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को तो मान लिया”

☞"वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10साल से भी अधिक समय तक आजादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला |

☞"वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा परन्तु समकालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र को नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया

☞"विनायक दामोदर सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य-योद्धा थे जिन्हें 2-2 आजीवन कारावास  की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से वे राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए।

☞"वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता को 2-2 देशों ने  प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया।

☞"वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण  अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया।

☞"वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की  शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया।

☞"वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई

☞"वीर सावरकर ने राष्ट्रध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया था  जिसे राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने माना।

☞"उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया।  वे ऐसे प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के  अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुंचा।

☞"वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन  समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया।

☞"दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंडमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर  कील और कोयले से कविताएं लिखीं

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