Monday, April 26, 2021

The Finance Bill, 2021

 इस लेख में शामिल विषय इस प्रकार हैं:


 किसी फर्म / एओपी / बीओआई द्वारा अपने सहयोगियों या सदस्यों को धन या संपत्ति के हस्तांतरण पर कर [धारा 9 बी, धारा 45 (4) और धारा 48]

 [मूल्यांकन वर्ष 2021-22]


 कुछ शर्तों का अर्थ


 एक फर्म से एक भागीदार द्वारा व्यापार में पूंजीगत संपत्ति या स्टॉक की प्राप्ति पर आय [धारा 9 बी]


 फर्म के पुनर्गठन के संबंध में भागीदार द्वारा धन या पूंजीगत संपत्ति की प्राप्ति पर कर [धारा 45 (4)]


 पूंजीगत लाभ की गणना का तरीका [धारा 48]


 डब्लूडीवी से घटाई जाने वाली परिसंपत्तियों के मौजूदा ब्लॉक का हिस्सा सद्भावना

 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 पृष्ठभूमि


 संशोधन वित्त विधेयक, 2021 द्वारा प्रस्तावित


 विधेयक में अस्पष्टता


 वित्त विधेयक (लोकसभा) में स्पष्टता


 निर्धारित तरीके से गणना की जाने वाली स्लम बिक्री के तहत हस्तांतरित पूंजीगत परिसंपत्तियों का एफएमवी

 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 परिचय


 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधन


 संशोधन का प्रभाव


 पीएफ अंशदान पर अर्जित ब्याज पर कर रुपये से अधिक है।  2.50 लाख या रु।  5 लाख


 टैक्स ऑडिट: गैर-खाता दाता चेक / ड्राफ्ट के माध्यम से तय किया गया लेनदेन एक नकद लेनदेन है

 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 HUF धारा 44ADA के तहत प्रकल्पित कराधान योजना के लिए भी पात्र नहीं है

 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 आय के फर्जी रिटर्न में डिफ़ॉल्ट के लिए शुल्क


 आधार और पैन को जोड़ने में डिफ़ॉल्ट के लिए शुल्क


 यदि MAT क्रेडिट का उपयोग किया गया है तो पिछले वर्ष के पुस्तक लाभ की कोई पुन: गणना नहीं

 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 यूलिप पर टैक्स


 परिचय


 वित्त विधेयक, 2021 द्वारा संशोधन


 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधन


 'टैक्स के लिए उत्तरदायी' की परिभाषा


 बुनियादी ढांचे और विकास के वित्तपोषण के लिए स्थापित 'डीएफआई' और 'संस्थान' की आय पर कोई कर नहीं

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 वित्तीय संस्थान को छूट [धारा 10 (48 डी)]


 DFI को छूट [धारा 10 (48E)]


 जीवनसाथी द्वारा जीवनसाथी को रिटर्न फाइल करने की नियत तारीख


 आईटीआर संशोधित और संशोधित दाखिल करने की नियत तारीख


 पुनर्मूल्यांकन की नई योजना


 वित्त विधेयक, 2021 द्वारा प्रस्तावित परिवर्तन


 आकलन या पुनर्मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन के लिए आकलन या आश्वस्त करने की शक्ति


 सूचना सर्वेक्षण के मामले में आय से बचने का सुझाव देती है


 अनुरोध के मामले में आय से बचने का सुझाव देने वाली जानकारी


 । एसेट ’का अर्थ आय भागने के आकलन का प्रतिनिधित्व करता है


 मूल्यांकन के समापन के लिए समय सीमा का बहिष्करण


 निपटान आयोग के समक्ष दायर आवेदन की वापसी पर मूल्यांकन पूरा करने की समय-सीमा


 AAR से पहले लंबित आवेदन


 धारा 10 (23FE) के तहत छूट के लिए विस्तारित निवेश का दायरा


 परिचय


 वित्त विधेयक, 2021 द्वारा संशोधन


 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधन


 एक IFSC [धारा 10 (4F)] की इकाई के लिए विमान के पट्टे से एक अनिवासी की आय

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 छूट परिचालन और वित्त पट्टा शुल्क दोनों के लिए उपलब्ध होगी


 धारा 80 एलए के तहत कटौती के लिए पात्र होने के लिए IFSC की इकाई को हटा दिया गया है


 'विमान' का अर्थ परिभाषित किया गया है


 अनिवासी निवेशकों के लिए उपलब्ध होने की छूट और श्रेणी- III एआईएफ [धारा 10 (23 एफएफ)]

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 भारत या IFSC [धारा 115ACA] के बाहर स्थित विदेशी डिपॉजिटरी बैंक द्वारा जारी जीडीआर से आय पर कराधान

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 श्रेणी- I और श्रेणी- II AIF के मामले में लागू विनियम [धारा 115UB]

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 लेन-देन को हस्तांतरण नहीं माना जाता है


 बुनियादी ढांचे और विकास के वित्तपोषण के लिए स्थापित एक संस्थान (इंडियन 47) द्वारा भारतीय इन्फ्रा फाइनेंस कंपनी द्वारा पूंजीगत संपत्ति का हस्तांतरण (धारा 47)


 केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित योजना के तहत पूंजीगत संपत्ति का हस्तांतरण (धारा 47 (viiaf))


 सत्यापन इकाई के कार्यों का प्रदर्शन


 अपतटीय बैंकिंग इकाई के निवेश प्रभाग को श्रेणी- I FPI के रूप में पंजीकृत किया जाना चाहिए और श्रेणी- III AIF [धारा 10 (4D) और 115AD] के रूप में नहीं

 [मूल्यांकन वर्ष 2022-23 से लागू]


 धारा 115 क के तहत क्यूरेटिव संशोधन


 भारतीय स्टाम्प अधिनियम में परिवर्तन


 परिचय


 वित्त विधेयक, 2021 द्वारा संशोधन


 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधन


 23 मार्च 2021 को लोकसभा ने वित्त विधेयक, 2021 पारित किया है। मूल रूप से 01 फरवरी, 2021 को लोकसभा में पेश किया गया विधेयक अपने मूल आकार में पारित नहीं हुआ है।  वित्त विधेयक, २०२१ में १०० से अधिक परिवर्तन लोकसभा द्वारा पारित किए गए [इसके बाद वित्त विधेयक (लोकसभा)] के रूप में संदर्भित किए गए हैं।  नए संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं, कुछ प्रस्तावित संशोधन हटा दिए गए हैं या बदल दिए गए हैं।


 वित्त विधेयक (लोकसभा) ने विभिन्न क्यूरेटिव संशोधन भी पेश किए हैं।  उदाहरण के लिए, धारा 43 (6) (ग) को वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधित किया गया है ताकि परिसंपत्ति के ब्लॉक की डब्ल्यूडीवी को कम किया जा सके यदि सद्भावना उस ब्लॉक का हिस्सा बनती है।  इसके अलावा, धारा 234F रुपये की देर से दाखिल करने वाली फीस को वापस लेने के लिए संशोधित किया गया है।  मूल्यांकन वर्ष 2021-22 से 01 जनवरी के बाद या बाद में 10,000 रिटर्न के रूप में दायर नहीं किया जा सकता है।


 वित्त विधेयक, 2021 में किए गए सभी बदलावों का एक टुकड़ा जो लोकसभा के वित्त विधेयक, 2021 द्वारा पारित किया गया है, यहां प्रस्तुत हैं:


 किसी फर्म / एओपी / बीओआई द्वारा अपने सहयोगियों या सदस्यों को धन या संपत्ति के हस्तांतरण पर कर [धारा 9 बी, धारा 45 (4) और धारा 48]


 [मूल्यांकन वर्ष 2021-22]

 जहां किसी भी भागीदार को फर्म के विघटन या पुनर्गठन के कारण कोई भी राशि या संपत्ति प्राप्त होती है, ऐसे मामलों में साझेदार या फर्म के हाथों में आयकर निहितार्थ हमेशा एक विवादास्पद मामला रहा है।  उनमें से कुछ नीचे चर्चा कर रहे हैं:


 क्या अभिव्यक्ति "फर्म के विघटन या अन्यथा" में फर्म का पुनर्गठन शामिल है?


 क्या विचार (धन में या तरह से) फर्म से एक साथी द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जिसे साझेदारी फर्म में उसकी रुचि के हस्तांतरण के कारण प्राप्त किया जा सकता है?


 क्या किसी फर्म द्वारा अपने साझेदारों द्वारा संपत्ति (स्टॉक-इन-ट्रेड और पूंजीगत संपत्ति) का हस्तांतरण आयकर उद्देश्यों के लिए हस्तांतरण के रूप में माना जाता है?  यदि हाँ, तो क्या इस तरह के हस्तांतरण से होने वाली आय फर्म के हाथों में कर के लिए कर योग्य है?


 ऐसे मामलों में आय की गणना करने का तंत्र क्या होगा?


 जहां एक फर्म संपत्ति का पुनर्मूल्यांकन करती है या खाते की किताबों में स्व-सृजित परिसंपत्ति को रिकॉर्ड करती है और साझेदारों के पूंजीगत खातों के लिए इसी लाभ का श्रेय देती है, साझेदार द्वारा अधिक मात्रा में प्राप्त राशि का कर उपचार क्या होना चाहिए  इस तरह के पुनर्मूल्यांकन या स्व-जनित संपत्ति के कारण उसका पूंजीगत योगदान?


 वित्त विधेयक (लोकसभा) ने धारा 9 बी को शामिल करके, धारा 45 (4) को प्रतिस्थापित करके और धारा 48 (iii) को सम्मिलित करके उपरोक्त मुद्दों को संबोधित किया है।  संशोधन को समझने से पहले, यह समझना अनिवार्य है कि जब कोई साझेदार उस फर्म द्वारा उसके द्वारा किसी संपत्ति के हस्तांतरण के बदले साझेदारी फर्म से अलग हो जाता है, तो दो लेनदेन होंगे।  एक, पार्टनर द्वारा राइट का ट्रांसफर और दूसरा, फर्म द्वारा पार्टनर को प्रॉपर्टी ट्रांसफर करना।  पूर्व लेनदेन को धारा 45 (4) और बाद की धारा 9 बी के तहत निपटाया जाता है।


 १.१ कुछ शर्तों का अर्थ


 धारा 9 बी 'निर्दिष्ट इकाई' और 'निर्दिष्ट व्यक्ति' के अर्थ को परिभाषित करता है।


 "निर्दिष्ट इकाई" का अर्थ है एक फर्म या अन्य एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स (एओपी) या बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स (बीओआई) [कंपनी या सहकारी समिति नहीं]।  सरलता के लिए, इसके बाद 'निर्दिष्ट इकाई' को 'फर्म' के रूप में संदर्भित किया जाता है।


 "निर्दिष्ट व्यक्ति" का अर्थ है, वह व्यक्ति जो किसी पिछले वर्ष में किसी AOP या BOI (कंपनी या सहकारी समिति का न होकर) के किसी फर्म या सदस्य का भागीदार हो।  सरलता के लिए, इसके बाद 'निर्दिष्ट व्यक्ति' को 'भागीदार' के रूप में जाना जाता है।


 1.2 एक फर्म से भागीदार द्वारा व्यापार में पूंजीगत संपत्ति या स्टॉक की प्राप्ति पर आय [धारा 9 बी]


 धारा 9 बी यह प्रदान करता है कि पिछले वर्ष के दौरान किसी भी पूंजीगत परिसंपत्ति या स्टॉक-इन-ट्रेड या इस तरह के फर्म के विघटन या पुनर्गठन के संबंध में एक फर्म से प्राप्त होता है, तो उस फर्म को ऐसी पूंजी परिसंपत्ति या स्थानांतरित करने के लिए समझा जाएगा  स्टॉक-इन-ट्रेड या दोनों, जैसा कि उस वर्ष के भागीदार के लिए हो सकता है, जिसमें व्यापार में ऐसी पूंजीगत संपत्ति या स्टॉक या दोनों उस भागीदार द्वारा प्राप्त किए जाते हैं।


 इसके अलावा, यह प्रदान करता है कि व्यापार या दोनों में पूंजीगत परिसंपत्ति या स्टॉक के ऐसे डीम्ड ट्रांसफर से होने वाला कोई भी लाभ और लाभ, जैसा भी हो, फर्म द्वारा पिछले वर्ष की उस फर्म की आय को समझा जाएगा, जिसमें स्टॉक है  भागीदार या पूंजीगत संपत्ति को अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, प्रमुख को 'व्यापार या पेशे' या 'पूंजीगत लाभ' के तहत आयकर के प्रभार से प्राप्त किया गया था।


 इसके अलावा, भागीदार द्वारा अपनी प्राप्ति की तारीख पर पूंजीगत संपत्ति या स्टॉक का उचित बाजार मूल्य, फर्म द्वारा ऐसे स्टॉक या पूंजीगत संपत्ति के डीम्ड ट्रांसफर से उत्पन्न लाभ और लाभ की गणना करते समय विचार का पूरा मूल्य समझा जाएगा।


 धारा 9 बी भी "निर्दिष्ट इकाई के पुनर्गठन" के भावों को परिभाषित करता है।  इसका मतलब है जहां:


 इसका एक या अधिक भागीदार या सदस्य भागीदार या सदस्य बनना बंद कर देता है;


 एक या एक से अधिक नए भागीदारों या सदस्यों को भर्ती किया जाता है।  हालांकि, कम से कम एक मौजूदा साथी या सदस्य को नए भागीदार (सदस्यों) या सदस्य (ओं) के प्रवेश के बाद निर्दिष्ट इकाई का भागीदार या सदस्य होना चाहिए;  या


 सभी साझेदार या सदस्य अपने संबंधित हिस्से में या उनमें से कुछ के हिस्से में परिवर्तन के साथ जारी हैं।


 इसके अलावा, सीबीडीटी को इस खंड के प्रावधानों को प्रभावी करने में आ रही कठिनाइयों को दूर करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के साथ दिशानिर्देश जारी करने का अधिकार है।  ऐसे प्रत्येक दिशानिर्देश संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखे जाएंगे और आयकर अधिकारियों और निर्धारिती के लिए बाध्यकारी होंगे।


 धारा 9 बी निम्नलिखित तीन पहलुओं से संबंधित है।


 1.2-1 किसी फर्म द्वारा अपने भागीदार को स्टॉक या पूंजीगत संपत्ति का वितरण हस्तांतरण के रूप में समझा जाता है


 यह प्रावधान एक निंदनीय गल्प बनाता है कि किसी फर्म द्वारा अपने साथी को स्टॉक या पूंजीगत संपत्ति का वितरण एक हस्तांतरण है।  यह विभिन्न न्यायिक फैसलों को खत्म करने के लिए किया जाता है जो यह मानते थे कि विघटन या पुनर्गठन पर एक साझेदारी फर्म द्वारा परिसंपत्तियों का वितरण, विभाजन या आवंटन, भागीदारों के बीच अधिकारों के आपसी समायोजन के अलावा और कुछ नहीं है।


 मालाबार मत्स्य पालन कंपनी बनाम सीआईटी [1979] 2 टैक्समैन 409 (एससी) के मामले में शीर्ष अदालत ने माना है कि भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के तहत एक साझेदारी फर्म, एक अलग कानूनी इकाई नहीं है, इसके अलावा साझेदार इसके गठन से  ।  इस तरह, फर्म के पास साझेदारी परिसंपत्तियों में अपने स्वयं के कोई अलग अधिकार नहीं होते हैं और जब फर्म की संपत्ति या फर्म की संपत्ति की एक बात होती है, तो इसका मतलब सभी संपत्ति या संपत्ति होती है जिसमें सभी साझेदारों का संयुक्त या सामान्य हित होता है।  यदि वह स्थिति है, तो इस विवाद को सुलझाना मुश्किल है कि साझेदारी परिसंपत्तियों में फर्म के अधिकारों को भंग करने पर बुझ जाती है।  इस तरह, फर्म के पास साझेदारी परिसंपत्तियों में अपने स्वयं के कोई अलग अधिकार नहीं हैं, लेकिन यह साझेदार हैं जो संयुक्त रूप से अपनी संपत्ति के मालिक हैं।  इसलिए, साझेदारी के लिए परिसंपत्तियों के वितरण, विभाजन या आवंटन का परिणाम, जो देनदारियों के निर्वहन के बाद विघटन पर बहता है, कुछ भी नहीं है, लेकिन भागीदारों के बीच अधिकारों का आपसी समायोजन और फर्म के अधिकारों के किसी भी बुझाने का कोई सवाल नहीं है।  धारा 2 (47) के अर्थ में परिसंपत्तियों के हस्तांतरण के लिए साझेदारी की गई परिसंपत्तियाँ।


 अब, धारा 9 बी, ने विघटन या पुनर्गठन के समय स्टॉक या पूंजीगत परिसंपत्ति के प्रवाह के रूप में हस्तांतरण के रूप में इलाज के लिए एक नीरस कल्पना बनाई है।


 1.2-2 स्टॉक-इन-ट्रेड के हस्तांतरण से प्राप्त होने वाले लाभ की गणना कैसे करें?


 धारा 9 बी की उप-धारा (2) प्रदान करती है कि स्टॉक-इन-ट्रेड के डीम्ड ट्रांसफर से होने वाले किसी भी लाभ और लाभ को उस वर्ष के भागीदार की आय माना जाएगा, जिसमें इस तरह का स्टॉक पार्टनर को प्राप्त होता है और, तदनुसार,  इसे "लाभ और व्यवसाय या पेशे से लाभ" के तहत कर लगाया जाएगा।


 इस तरह की गणना के लिए, यह प्रदान करता है कि भागीदार द्वारा अपनी प्राप्ति की तारीख पर स्टॉक का उचित बाजार मूल्य, फर्म द्वारा ऐसे स्टॉक के डीम्ड हस्तांतरण से उत्पन्न लाभ और लाभ की गणना करते समय विचार का पूर्ण मूल्य माना जाएगा।  स्टॉक के हस्तांतरण से उत्पन्न होने वाली आय धारा 28 के तहत व्यावसायिक आय के रूप में कर योग्य होगी। सरल शब्दों में, साझेदार को हस्तांतरित किए गए स्टॉक का उचित बाजार मूल्य फर्म द्वारा बिक्री के रूप में दर्ज किया जाएगा जैसा कि व्यवसाय का हिस्सा होगा  कंपनी।


 1.2-3 कैपिटल एसेट के डीम्ड ट्रांसफर से होने वाले लाभ की गणना कैसे करें?


 धारा 9 बी की उप-धारा (2) में यह प्रावधान है कि पूंजीगत परिसंपत्ति के डीम्ड ट्रांसफर से होने वाले किसी भी लाभ और लाभ को उस वर्ष की फर्म की आय माना जाएगा जिसमें ऐसी पूंजी परिसंपत्ति भागीदार को प्राप्त होती है।  इसे "कैपिटल गेन्स" के तहत लगाया जाएगा।


 इसके अलावा, यह प्रदान करता है कि भागीदार द्वारा इसकी प्राप्ति की तारीख को पूंजीगत संपत्ति का उचित बाजार मूल्य फर्म द्वारा ऐसे स्टॉक के डीम्ड हस्तांतरण से उत्पन्न होने वाले पूंजीगत लाभ की गणना करते समय विचार का पूर्ण मूल्य माना जाएगा।


 हेड कैपिटल गेन के तहत इनकम टैक्सेबल का निर्धारण विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है जैसे कि कैपिटल एसेट की प्रकृति, होल्डिंग की अवधि, अधिग्रहण की लागत, विचार का पूरा मूल्य आदि। सेक्शन 48 हेड कैपिटल गेन के तहत इनकम टैक्सेबल की गणना का तरीका बताता है।  ।  जैसा कि कहा गया है, पूंजीगत संपत्ति के विचार के पूर्ण मूल्य से अधिग्रहण की लागत, सुधार की लागत और जिम्मेदार व्यय को कम करके पूंजीगत लाभ की गणना की जाती है।


 धारा 9 बी की धारा और 45 (4) के प्रतिस्थापन के कारण उत्पन्न दोहरे कराधान को कम करने के लिए वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा धारा 48 में भी संशोधन किया गया है।  एक नया खंड (iii) उस लाभ और लाभ को प्रदान करने के लिए डाला गया है, जो धारा 45 (4) के तहत कर के लिए लाभकारी है, जो कि फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही पूंजीगत संपत्ति के लिए जिम्मेदार है, जबकि फर्म के संबंध में पूंजीगत लाभ की गणना करते समय कम किया जाएगा।  ऐसी पूंजीगत संपत्ति।  दूसरे शब्दों में, धारा 45 (4) के तहत गणना की गई पूंजीगत लाभ की राशि जो फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही पूंजीगत संपत्ति के कारण है, ऐसी पूंजीगत संपत्ति के संबंध में फर्म के हाथों में पूंजीगत लाभ की गणना करते समय कटौती की जाएगी।


 धारा 48 (iii) के साथ धारा 9 बी के तहत पूंजीगत लाभ की गणना निम्नानुसार होगी:


 विशेष रूप से प्राप्त विचार या अर्जित धन (पूंजीगत संपत्ति का FMV)


 कम:


 (ए) स्थानांतरण के संबंध में पूर्ण और विशेष रूप से व्यय;


 (बी) अधिग्रहण की लागत / अनुक्रमित लागत;


 (ग) सुधार की लागत / सुधार की अनुक्रमित लागत;  या


 (घ) धारा 45 (4) के तहत फर्म की आय के रूप में कर की राशि जो फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही पूंजीगत संपत्ति के लिए देय है


 (ई) उपरोक्त गणना के शुद्ध परिणाम की सीमा तक ५४ से ५४ जीबी के तहत छूट


 xxx


 (xxx)


 (xxx)


 (xxx)


 (xxx)


 (xxx)


 हेड कैपिटल गेनक्सक्स के तहत आयकर योग्य


 जिस दर पर इस तरह के पूंजीगत लाभ पर कर लगाया जाएगा, वह हस्तांतरित की गई पूंजीगत संपत्ति की प्रकृति और उस अवधि पर निर्भर करता है जिसके लिए ऐसी परिसंपत्ति निर्दिष्ट इकाई के पास है।


 1.3 फर्म के पुनर्गठन के संबंध में भागीदार द्वारा धन या पूंजीगत संपत्ति की प्राप्ति पर कर [धारा 45 (4)]


 वित्त विधेयक (लोकसभा), ने उप-धारा (4) को वित्त विधेयक, 2021 द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने के रूप में प्रस्तावित किया है। यह प्रावधान प्रदान करता है कि एक भागीदार को पिछले वर्ष के दौरान किसी भी पूंजीगत संपत्ति या धन या किसी फर्म से प्राप्त होता है।  पुनर्गठन के सिलसिले में निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा पैसे की प्राप्ति के बाद होने वाले किसी भी लाभ और लाभ को पिछले वर्ष के प्रमुख "कैपिटल गेन्स" के तहत निर्दिष्ट इकाई की आय माना जाएगा जिसमें ऐसी पूंजीगत संपत्ति या धन या दोनों  निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए गए थे।  इसके अलावा, यह फर्म से इस तरह के धन या पूंजीगत संपत्ति की प्राप्ति से भागीदार को होने वाले लाभ और लाभ की गणना करने के सूत्र को भी निर्धारित करता है।


 लाभ और लाभ की गणना निम्न सूत्रों के अनुसार की जाएगी:


 ए = बी + सी-डी


 ए = प्रधान पूंजीगत लाभ के तहत फर्म की आय के रूप में इस प्रावधान के तहत आयकर में आय;


 बी = ऐसी रसीद की तारीख को साझेदार द्वारा प्राप्त धन का मूल्य;


 सी = ऐसी रसीद की तारीख को भागीदार द्वारा प्राप्त पूंजीगत संपत्ति का उचित बाजार मूल्य;  तथा


 डी = पुनर्गठन के समय फर्म के खातों की पुस्तकों में भागीदार के पूंजी खाते में (किसी भी तरीके से प्रतिनिधित्व) शेष।


 जहां A का मान ऋणात्मक है, उसे शून्य माना जाएगा।


 फर्म के खातों की भागीदार की पूंजी खाते में शेष राशि की गणना करते समय, निम्नलिखित के कारण पूंजी खाते में वृद्धि निम्न में नहीं होगी:


 किसी भी संपत्ति का पुनर्गठन;


 स्व-निर्मित सद्भावना (खरीद या व्यवसाय के दौरान उत्पन्न होने वाली किसी भी लागत के बिना प्राप्त की गई सद्भावना) या व्यवसाय या पेशे के दौरान उत्पन्न हुई है;


 अन्य स्व-निर्मित संपत्ति।


 स्पष्टीकरण 2 से धारा 45 (4) में स्पष्ट किया गया है कि जब पुनर्गठन के संबंध में एक फर्म से भागीदार द्वारा एक पूंजीगत संपत्ति प्राप्त की जाती है, तो धारा 9 बी के प्रावधानों के अलावा उक्त अनुभाग के प्रावधान संचालित होंगे।  इस प्रकार, दोनों प्रावधानों के तहत कराधान स्वतंत्र रूप से काम किया जाएगा।


 1.3-1 धारा 45 का विश्लेषण (4)


 धारा 45 (4) पूंजीगत लाभ की गणना के लिए प्रदान करता है जो फर्म के पुनर्गठन के संबंध में फर्म में अपने अधिकार को छोड़ने या छोड़ने पर एक साथी के लिए उठता है।  यद्यपि आय भागीदार के रूप में होती है लेकिन इसे फर्म की आय के रूप में समझा जाता है।  इस प्रकार, फर्म को अपनी आय के लिए धारा 9 बी के तहत और उसके बाद होने वाली आय के लिए धारा 45 (4) के तहत मूल्यांकन किया जाएगा।


 1.3-2 धारा 45 (4) बनाम धारा 9 बी


 धारा 9 बी में विघटन या पुनर्गठन के समय उत्पन्न होने वाली कर देयता है।  जबकि धारा ४५ (४) केवल पुनर्गठन के समय की करबद्धता से संबंधित है।  जहां किसी भी संपत्ति या धन को विघटन के समय भागीदार या सदस्य को हस्तांतरित किया जाता है, समान मात्रा में छूट या अधिकारों का त्याग।  "स्थानांतरण" शब्द को धारा 2 (47) के तहत परिभाषित किया गया है, इसके दायरे में अधिकार से छूटना या छोड़ना शामिल है।  हालाँकि, विघटन के मामले में इस तरह के अधिकार किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में नहीं बुझते या त्याग दिए जाते हैं, इसलिए कोई भी इससे कोई लाभ प्राप्त नहीं करता है।  इस प्रकार, विघटन के समय धारा 45 (4) लागू नहीं होती है।


 1.4 पूंजीगत लाभ की गणना की विधि [धारा 48]


 धारा 9 बी विघटन या पुनर्गठन के संबंध में एक भागीदार को पूंजीगत परिसंपत्ति के हस्तांतरण पर फर्म को होने वाली आय की कराधान से संबंधित है।  धारा 45 (4) उस आय से संबंधित है जो पुनर्गठन के संबंध में पूंजीगत संपत्ति की प्राप्ति पर भागीदार को मिलती है।  हालांकि, ऐसी रसीद के संबंध में कर केवल फर्म के हाथों में लगाया जाता है।  इस प्रकार, पुनर्गठन के मामले में धारा 45 बी (धारा) के तहत एक बार पढ़ने पर दोहरी कर-क्षमता पैदा हो जाएगी और धारा 45 (4) के तहत दूसरी धारा 9 बी के साथ पढ़ेगी।  ऐसे दोहरे कराधान के प्रभाव को हटाने के लिए, धारा 48 में संशोधन किया जाता है।  यह खंड प्रधान पूंजीगत लाभ के तहत आय प्रभार्य की गणना करते समय पूंजीगत संपत्ति के विचार के पूर्ण मूल्य से हस्तांतरण के संबंध में अधिग्रहण, सुधार और व्यय की लागत में कमी प्रदान करता है।


 धारा 45 (4) के तहत धारा 45 (4) के तहत लगाए गए पूंजीगत लाभ के संबंध में अतिरिक्त कटौती की अनुमति है, जो कि फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही पूंजीगत संपत्ति के कारण है।  दूसरे शब्दों में, धारा 45 (4) के तहत लगाए गए पूंजीगत लाभ का एक हिस्सा फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही पूंजी परिसंपत्ति के पूर्ण मूल्य से कम हो जाएगा।  इस तरह का हिस्सा केवल उस पूंजीगत संपत्ति के लिए जिम्मेदार होगा जो फर्म द्वारा हस्तांतरित की जा रही है।  रोपण की यह विधि CBDT द्वारा निर्धारित की जाएगी।


 डब्लूडीवी से घटाई जाने वाली परिसंपत्तियों के मौजूदा ब्लॉक का हिस्सा सद्भावना


 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 २.१ पृष्ठभूमि


 मूल्यह्रास आयकर अधिनियम के तहत एक भत्ता है जो संपत्ति के संबंधित ब्लॉक के आधार पर लिखित-डाउन मूल्य (डब्ल्यूडीवी) विधि के अनुसार गणना की जाती है।  दूसरे शब्दों में, मूल्यह्रास की गणना के लिए, संपत्ति के प्रासंगिक ब्लॉक और इसके लिखित-डाउन मूल्य की पहचान करना आवश्यक है।


 'संपत्ति का ब्लॉक' परिसंपत्तियों के एक वर्ग के भीतर गिरने वाली संपत्ति का एक समूह है जिसके लिए मूल्यह्रास की समान दर निर्धारित है।  उदाहरण के लिए, सभी अमूर्त संपत्ति मूल्यह्रास की 25% दर के लिए पात्र हैं।


 धारा 43 (6) (ग) के अनुसार, संपत्ति के एक 'ब्लॉक का लिखित मूल्य', पिछले वर्ष की शुरुआत में संपत्ति के उस ब्लॉक के भीतर आने वाली सभी परिसंपत्तियों के डब्ल्यूडीवी का कुल योग है और:


 पिछले वर्ष के दौरान अर्जित उस ब्लॉक के भीतर गिरने वाली किसी भी संपत्ति की वास्तविक लागत में वृद्धि;


 पिछले वर्ष के दौरान किसी भी परिसंपत्ति (उस ब्लॉक के भीतर गिरने) के संबंध में देय पैसे से घटाया जाता है जिसे बेचा या खारिज या ध्वस्त या नष्ट कर दिया जाता है।


 विशेष रूप से संपत्ति के ब्लॉक के WDV


 जोड़ें: उस ब्लॉक के तहत पिछले वर्ष के दौरान अर्जित किसी भी संपत्ति की वास्तविक लागत


 कम: किसी भी संपत्ति के संबंध में देय धन, पिछले वर्ष के दौरान स्क्रैप के साथ बेची गई, नष्ट की गई या नष्ट कर दी गई, यदि कोई हो


 xxx


 xxx


 (xxx)


 परिसंपत्तियों के ब्लॉक के WDV को बंद करना


 2.2 वित्त विधेयक, 2021 द्वारा प्रस्तावित संशोधन


 वित्त विधेयक 2021 में सद्भावना पर मूल्यह्रास को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव है।  अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों में निम्नलिखित संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं:


 2.2-1 धारा 2 (11) में संशोधन


 यह प्रस्तावित किया गया है कि 'संपत्ति का खंड' जैसा कि धारा 2 (11) के तहत परिभाषित किया गया है, इसमें किसी व्यवसाय या पेशे की सद्भावना शामिल नहीं होगी '।


 2.2-2 धारा 32 में संशोधन (1)


 खंड (ii) से धारा 32 (1) में संशोधन किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी व्यवसाय या पेशे की सद्भावना मूल्यह्रास के योग्य नहीं होगी।  इसके अलावा, स्पष्टीकरण 3 से धारा 32 (1) के लिए एक संशोधन प्रस्तावित किया गया है जो अभिव्यक्ति 'संपत्ति' को परिभाषित करता है।  यह प्रस्तावित किया गया है कि किसी व्यवसाय या पेशे की सद्भावना को धारा 32 (1) के लिए 'अमूर्त संपत्ति' के रूप में नहीं माना जाएगा।


 2.2-3 धारा 50 में संशोधन


 धारा 50 (2) में एक नया प्रोविसो डाला जाना प्रस्तावित है कि सीबीडीटी परिसंपत्ति और अल्पकालिक पूंजीगत लाभ के ब्लॉक की डब्ल्यूडीवी को निर्धारित करने के लिए एक तरीका लिख ​​सकता है यदि सद्भावना परिसंपत्ति और मूल्यह्रास के ब्लॉक का हिस्सा है।  उस पर दावा किया गया।


 2.2-4 धारा 55 में संशोधन


 धारा 55 पूंजीगत लाभ की गणना के लिए 'अधिग्रहण की लागत' सहित विभिन्न शर्तों का अर्थ प्रदान करता है।  वित्त विधेयक भी धारा 55 में संशोधन का प्रस्ताव करता है।


 2.3 विधेयक में अस्पष्टता


 वित्त विधेयक, 2021 में आयकर अधिनियम के उपर्युक्त चार खंडों में संशोधन करने की मांग की गई थी, लेकिन इसने धारा 43 में किसी भी संशोधन का प्रस्ताव नहीं किया है, जो परिसंपत्तियों के ब्लॉक की डब्ल्यूडीवी को परिभाषित करता है।


 इस प्रकार, सवाल उठे कि सद्भावना की मात्रा का क्या होगा जो परिसंपत्तियों के मौजूदा ब्लॉक का हिस्सा बन गया।  एक बार जब कोई परिसंपत्ति an ब्लॉक ऑफ एसेट्स ’का हिस्सा बन जाती है, तो यह अपनी पहचान खो देता है और संपत्ति के पूरे ब्लॉक पर अपव्यय की अनुमति दी जाती है।  इसलिए, यदि किसी निर्धारिती के पास अमूर्त संपत्ति का ब्लॉक है और किसी भी पिछले वर्ष में उसने सद्भावना का अधिग्रहण किया है, जिसने संपत्ति के ऐसे ब्लॉक का हिस्सा बनाया है, तो संपत्ति के ऐसे ब्लॉक पर मूल्यह्रास की अनुमति कैसे दी जाएगी।


 2.4 वित्त विधेयक (लोकसभा) में स्पष्टता


 लोकसभा द्वारा पारित वित्त विधेयक, 2021, धारा 43 (6) (सी) में आवश्यक संशोधन करता है, यह प्रदान करने के लिए कि परिसंपत्तियों के ब्लॉक की डब्ल्यूडीवी ऐसी परिसंपत्तियों के ब्लॉक के भीतर गिर रही सद्भावना की वास्तविक लागत से कम हो जाएगी।  हालांकि, सद्भावना की वास्तविक लागत पहले से कम हो जाएगी:


 मूल्यह्रास की राशि वास्तव में आकलन वर्ष 1988-89 से पहले इस तरह के सद्भावना के लिए निर्धारिती को अनुमति दी, और


 मूल्यह्रास की राशि जो आकलन वर्ष 1988-89 से निर्धारिती के लिए स्वीकार्य होगी जैसे कि संपत्ति के संबंधित ब्लॉक में सद्भावना एकमात्र संपत्ति थी।


 यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आकलन वर्ष 2021-22 के लिए डब्ल्यूडीवी की गणना करते समय, यदि पिछले वर्ष तुरंत पूर्ववर्ती संपत्ति के ब्लॉक का हिस्सा बनने वाले सद्भाव पर मूल्यह्रास का दावा किया गया था, तो ऊपर गणना की गई कमी की राशि डब्ल्यूडीवी से अधिक नहीं होगी।  संपत्ति के ब्लॉक के।


 उदाहरण के लिए, XYZ Limited एक विनिर्माण व्यवसाय चला रहा है।  10-04-2018 को, उसने एम एंड ए लेनदेन में निम्नलिखित अमूर्त संपत्ति का अधिग्रहण किया:


 सद्भावना रु।  100 करोड़;


 ट्रेडमार्क की कीमत रु।  50 करोड़;  तथा


 लाइसेंस और फ्रैंचाइज़ी का समझौता रु।  50 करोड़ रु।


 निम्नलिखित दो स्थितियों में 31 मार्च, 2021 को एक्सवाईजेड लिमिटेड की अमूर्त संपत्ति के ब्लॉक के डब्ल्यूडीवी की गणना करें:


 स्थिति 1 - अप्रैल 2019 में, XYZ Ltd. ने ट्रेडमार्क रुपये में बेचे।  40 करोड़।


 स्थिति 2 - अप्रैल 2019 में, XYZ Ltd. ने ट्रेडमार्क रुपये में बेचे।  80 करोड़।


 31-03-2021 को डब्ल्यूडीवी की गणना (करोड़ों में)


 विशेषांक 1 संस्वीकृति 2 वर्ष 2 वर्ष 2018-19 में विनिमेय संपत्ति 10 अप्रैल, 2018 से अर्जित- Goodwill100.00.00100.00- ट्रेडमार्कs50.0050.00- लाइसेंस और फ्रेंचाइजी 505050.00 अमूर्त संपत्ति के बैल [A] 200.00200.00Less: मूल्यह्रास [B * A * 25%] (50%)  ) (50.00) डब्ल्यूडीवी 31-03-2019 को [सी = एबी] 150.00150.00 पिछले वर्ष 2019-20 ओपेनिंग डब्ल्यूडीवी [सी] 150.00150.00Less: वर्ष के दौरान बेची जाने वाली अमूर्त संपत्ति [डी] (40.00) (80.00) कम: मूल्यह्रास  [ई = (सी - डी) * २५%] (२ (.५०) (१ W.५०) डब्ल्यूडीवी ३१-०३-२०२० के रूप में [एफ = सी - डी - ई] 52२.५०५२.५० पिछले वर्ष २०२०-२१ अप्रैल को डब्लूडीवी [एफ] 52२.५०५२० विज्ञापन अन्याय  सद्भावना के आधार पर: पिछले वर्षों के मूल्यह्रास [जी] (56.25) (52.50) द्वारा कम की गई संपत्ति के ब्लॉक में शामिल सद्भावना की वास्तविक लागत


 नोट देखें


 गुडविल 100 की लागत: मूल्य।  सद्भावना पर अनुमति दी गई: - स्पष्ट वर्ष २०१ 100-१९ [१०० * २५%] (२५.००) -प्राचीन वर्ष २०१ ९ -२० [(१००-२५) * २५%] (१75. )५) ५६.२५ वर्ष: मूल्यह्रास / एच = (एफ - जी)  * २५%] (६.५६) ४.० डब्ल्यूडब्ल्यूडी की अमूर्त संपत्ति के ब्लॉक के रूप में ३१-०३-२०१११ ९ .६ ९ ०.०० पर


 नोट: यदि सद्भावना उन संपत्तियों के ब्लॉक का हिस्सा है जिस पर पिछले वर्ष 2019-20 में दावा किया गया है, तो ऐसे सद्भावना के कारण 'कमी की मात्रा' डब्ल्यूडीवी से अधिक नहीं होगी, यह मानते हुए कि सद्भावना उस ब्लॉक में एकमात्र संपत्ति है  ।  जैसा कि स्थिति 2 में है, 'कमी की राशि' की गणना रुपये में की जाती है।  56.25 रु। की डब्ल्यूडीवी से अधिक है।  52.50, सद्भावना के कारण डब्ल्यूडीवी की कटौती रुपये तक सीमित रहेगी।  ५२.५०।


 निर्धारित तरीके से गणना की जाने वाली स्लम बिक्री के तहत हस्तांतरित पूंजीगत परिसंपत्तियों का एफएमवी


 [आकलन वर्ष 2021-22 से लागू]


 ३.१ परिचय


 2 मंदी की बिक्री ’शब्द को धारा 2 (42 सी) के तहत परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत संपत्ति और देनदारियों को सौंपे बिना एकमुश्त विचार के लिए बिक्री के परिणामस्वरूप एक या अधिक उपक्रमों का हस्तांतरण।  आयकर अधिनियम की धारा 50 बी में मंदी की स्थिति में पूंजीगत लाभ की गणना का प्रावधान है।


 जैसा कि मंदी की बिक्री का अर्थ है कि एकमुश्त विचार के लिए उपक्रम की बिक्री, कुछ अदालतों ने विचार किया है कि विनिमय, स्थानांतरण आदि के माध्यम से स्थानांतरण को मंदी की बिक्री के रूप में नहीं माना जाएगा।  इस मुद्दे पर स्पष्टता प्रदान करने के लिए, धारा 2 (42 सी) को वित्त विधेयक, 2021 द्वारा संशोधित करने का प्रस्ताव है, बशर्ते कि धारा 2 (47) के तहत परिभाषित सभी प्रकार के 'हस्तांतरण' को मंदी के दायरे में शामिल किया जाएगा।  हालांकि, वित्त विधेयक, 2021 ने धारा 50 बी में कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं किया है।


 धारा 50 बी (2) प्रदान करता है कि जहां एक उपक्रम या विभाजन का अधिग्रहण किया जाता है, ऐसे उपक्रम या विभाजन का शुद्ध मूल्य अधिग्रहण की लागत के रूप में माना जाता है।  इसके अलावा, अनुक्रमण का लाभ तब भी उपलब्ध नहीं होगा, जब मंदी के तहत हस्तांतरित किए गए उपक्रम को दीर्घकालिक पूंजीगत संपत्ति माना जाता है।  शुद्ध मूल्य की गणना के लिए तंत्र स्पष्टीकरण 2 से धारा 50 बी में प्रदान किया गया है।  यह प्रदान करता है कि निवल मूल्य की गणना करने के लिए, मूल्य के लिखित मूल्य पर मूल्यह्रास योग्य संपत्ति ली जाती है और पुस्तक मूल्य पर गैर-मूल्यह्रास संपत्ति होती है।  हालांकि, धारा 35 क के तहत कटौती के रूप में पूरी तरह से पूंजीगत परिसंपत्तियों को शून्य मूल्य पर लिया जाता है।


 3.2 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा संशोधन


 मौजूदा धारा 50 बी में एक मंदी की बिक्री के तहत उपक्रम के हस्तांतरण के संबंध में विचार के पूर्ण मूल्य की गणना के लिए कोई प्रावधान नहीं है।  वित्त विधेयक (लोकसभा) ने धारा 50B (2) में संशोधन किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हस्तांतरण की तिथि के अनुसार पूंजीगत संपत्ति का उचित बाजार मूल्य (एफएमवी) (मंदी के माध्यम से हस्तांतरित होने वाला एक उपक्रम या विभाजन) की गणना की जाएगी।  निर्धारित तरीके से।  ऐसी एफएमवी को ऐसी पूंजीगत संपत्ति के हस्तांतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्राप्त होने वाले विचार का पूर्ण मूल्य माना जाएगा।


 इसके अलावा, स्पष्टीकरण 2 में एक नया खंड यह प्रदान करने के लिए डाला गया है कि पूंजीगत संपत्ति का मूल्य सद्भावनापूर्ण हो, जिसे निर्धारिती द्वारा पिछले मालिक से खरीद कर प्राप्त नहीं किया गया है, शुद्ध मूल्य की गणना करते समय शून्य के रूप में लिया जाएगा।


 3.3 संशोधन का प्रभाव


 वित्त विधेयक (लोकसभा) द्वारा किए गए संशोधनों के अनुसार, बिक्री के दौरान हस्तांतरित किए गए उपक्रम या विभाजन के एफएमवी को ऐसे हस्तांतरण के परिणामस्वरूप विचार का पूर्ण मूल्य माना जाएगा।  यह भ्रामक कथा निम्नलिखित दो स्थितियों को जन्म दे सकती है:


 ट्रांसफ़र (खरीदार) से ट्रांसफ़ॉर्मर (विक्रेता) को प्राप्त वास्तविक राशि ऐसे एफएमवी से अधिक है;  या


 खरीदार से विक्रेता द्वारा प्राप्त वास्तविक राशि ऐसे एफएमवी से कम है।


 विक्रेता के हाथों में 3.3-1 कर निहितार्थ


 वास्तविक विचार की राशि के बावजूद, धारा 50B (2) (ii) में यह प्रावधान है कि पूंजीगत संपत्ति का FMV (इकाई या उपक्रम होने के नाते) 50B के तहत पूंजीगत लाभ की गणना के लिए विचार के पूर्ण मूल्य के रूप में लिया जाएगा।  ।  हालाँकि, इस तरह के पूर्ण मूल्य की गणना निर्धारित तरीके से की जाएगी।  इस संबंध में अधिक स्पष्टता प्रदान की जाएगी जब इस संबंध में नियम निर्धारित किए जाएंगे।  जहां वास्तविक विचार निर्धारित तरीके से निर्धारित एफएमवी से कम है, इसके परिणामस्वरूप इस डीमिंग फिक्शन के कारण विक्रेता के हाथों में उच्च पूंजीगत लाभ कर देयता होगी।


 खरीदार के हाथों में 3.3-2 कर निहितार्थ


 लेखांकन मानक 14 के अनुसार - समामेलन के लिए लेखांकन, खरीदार द्वारा अधिग्रहित विक्रेता की शुद्ध संपत्ति के मूल्य पर बिक्री के किसी भी विचार को खरीदार के वित्तीय वक्तव्यों में सद्भावना के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।  यदि विचार की राशि अर्जित की गई शुद्ध संपत्ति के मूल्य से कम है, तो अंतर को कैपिटल रिजर्व के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।


 इस प्रकार, अगर खरीदार ने मंदी की बिक्री में हस्तांतरित उपक्रम के एफएमवी से कम भुगतान किया है, तो वास्तविक विचार और एफएमवी के बीच के अंतर को पूंजी आरक्षित माना जाएगा।  ऐसे कैपिटल रिजर्व को कैपिटल रसीद के रूप में माना जाना चाहिए जो कर के लिए प्रभार्य नहीं है।  यह धारा 56 (2) (x) के तहत कर के रूप में या तो इकाई या उपक्रम 50B के तहत कवर किए जाने वाले कर के रूप में धारा 56 (2) (x) में परिभाषित संपत्ति के रूप में नहीं माना जा सकता है।


 हालांकि, अगर खरीदार ने एफएमवी से अधिक पर ध्यान दिया है, तो ऐसे अतिरिक्त विचार को खरीदार के खाते की पुस्तकों में सद्भावना के रूप में मान्यता दी जाएगी।  वित्त विधेयक, 2021 में सद्भावना पर मूल्यह्रास को प्रतिबंधित करने की मांग की गई है।  हालांकि, सद्भावना को पूंजीगत संपत्ति के रूप में माना जाएगा और इसके बाद के हस्तांतरण पर पूंजीगत लाभ होगा।


 पीएफ अंशदान पर अर्जित ब्याज पर कर रुपये से अधिक है।  2.50 लाख या रु।  5 लाख


 मौजूदा प्रावधान के अनुसार, कर्मचारियों द्वारा वैधानिक भविष्य निधि, मान्यताप्राप्त भविष्य निधि और सार्वजनिक भविष्य निधि में दिए गए योगदान पर कर से छूट प्राप्त है।


 The Finance Bill, 2021 proposed that no exemption shall be available for the interest income accrued during the previous year in the recognised and statutory provident fund to the extent it relates to the contribution made by the employees over Rs. 2,50,000 in the previous year. This amendment is applicable from the assessment year 2022-23. This amendment has been proposed as the Government noticed that some employees have been contributing a huge amount to these funds and earning interest free income. Thus, to curb this practice, the Government has proposed such amendment to Section 10(11) and Section 10(12). The amendment proposed that the taxable component shall be computed in such manner as may be provided by rules.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has added a second proviso to Section 10(11) and Section 10(12) that if an employee is contributing to the fund but there is no contribution to such fund by the employer, then the interest income accrued during the previous year shall be taxable to the extent it relates to the contribution made by the employee to that fund in excess of Rs. 5,00,000 in a financial year.


 The impact of this amendment can be understood with the help of the following example.


 Amount Contributed by assessee during Previous Year (INR)Whether employer contributing to fund?Whether interest earned shall be taxable?How much interest of employee’s contribution shall be taxable?  2,00,000YesNo–4,00,000YesYesInterest on contribution of Rs.  1,50,0006,00,000YesYesInterest on contribution of Rs.  3,50,0002,00,000NoNo–4,00,000NoNo–6,00,000NoYesInterest on contribution of Rs.  1,00,000


 The interest income shall be taxable under the head ‘Income from other sources’. Such income should be taxable as a residuary income as it is not accruing from a source emanating from an employer-employee relationship. This interest income will become part of the total taxable income of the taxpayer. There are no special rates for the taxability of this interest. Hence, such income shall be taxed at the prevailing income tax rates.


 Possibly, such interest component shall be subject to TDS under Section 194A by the EPFO.


 4.Tax Audit: Transaction settled by way of a non-account payee cheque/draft is a cash transaction


 [Applicable from Assessment Year 2021-22]

 Every person carrying on a business and maintaining books of account is required to get them audited from a Chartered Accountant if total sales, turnover or gross receipt from the business during the previous year exceeds Rs.  1 करोर।


 To reduce the compliance burden on small and medium enterprises, the Finance Act, 2020 has increased such threshold limit of turnover, for a person carrying on business, from Rs. 1 crore to Rs. 5 crores. The higher threshold limit applies only if the cash receipt and payment made during the year does not exceed 5% of total receipt and total payment respectively.


 The Finance Bill, 2021 has proposed to further increase this threshold limit from Rs.  5 crores to Rs.  10 करोड़।  The Finance Bill (Lok Sabha) inserts a new proviso that for computation of the threshold limit of Rs.  10 crores, the payment or receipt settled through a non-account payee cheque or non-account payee bank draft shall be deemed to be cash payment or cash receipt respectively.  Thus, the same shall be included while computing 5% cash transaction limit under section 44AB.


5. HUF is also not eligible for presumptive taxation scheme under section 44ADA


 [Applicable from Assessment Year 2021-22]


 Section 44ADA provides for computation of profit and gains of profession on a presumptive basis. It applies to an assessee engaged in the specified profession. Under the presumptive taxation scheme, the assessee computes the taxable income on a presumptive basis if gross receipts of the profession do not exceed Rs. 50 lakhs during the year. The presumptive income shall be 50% of total receipts of the year from such a profession.


 The existing Section 44ADA only provides that the benefit of this provision is available to an assessee being resident in India. It restricts an assessee on basis of residential status and not on basis of type of assessee. In other words, there was no explicit or obvious prohibition on the Companies, LLP or the HUF to compute the income under this presumptive scheme. The Finance Bill 2021 has specifically excluded an LLP from the scope of presumptive taxation under section 44ADA. Thus, the Finance Bill 2021 first time proposed to expressly limit the provisions of Section 44ADA to a resident assessee being an Individual, Hindu Undivided Family (HUF) or a partnership firm (other than an LLP). The Finance Bill (Lok Sabha) has further restricted the scope of section 44ADA. Now an HUF shall also not be eligible for presumptive taxation scheme under section 44ADA.


 Consequently, w.e.f. Assessment Year 2021-22, only a resident Individual and a resident partnership firm shall be eligible to compute the income under the said presumptive taxation scheme. An LLP, HUF, Company, AOP, BOI, etc. shall not be eligible to claim the benefit of Section 44ADA.


 6. Fee for default in furnishing return of income


 The late filing fee under Section 234F is charged when a person fails to furnish a return of income by the due date prescribed under section 139(1). The fees to be charged (Rs. 1,000 or Rs. 5,000 or Rs. 10,000) shall depend on the quantum of income and the date of filing of return of income.


 7. The fee for default in furnishing return of income is levied at the following rates:


 Amount of total incomeDate of filing of Income-tax returnFees (in Rs.)   Not liable to file return of incomeAny timeNilAny amount of IncomeOn or before the due dateNilUp to Rs. 500,000After the due date1,000Above Rs. 500,000After the due date but on or before December 31 of the relevant Assessment Year5,000Above Rs. 500,000After the due date but between January 1 and March 31 of the relevant Assessment Year10,000


 The Finance Bill, 2021 has proposed to reduce the time-limit to file belated or revised returns of income, as the case may be, by 3 months. Therefore, the last date to file the revised or belated return shall be 31st December of the relevant Assessment Year.


 As the last date cannot exceed 31st December, the higher late filing fees of Rs. 10,000 cannot be levied in any situation. The Finance Bill (Lok Sabha) has made a consequential amendment to Section 234F that the late-filing fee shall be Rs. 5,000. However, where the total income of a person does not exceed Rs. 5 Lakhs, the fee payable shall not exceed Rs. 1,000.


 After, the amendment, the late-filing fee shall be leviable in the following manner:


 Amount of total incomeDate of filing of Income-tax returnFees (in Rs.)   Not liable to file return of incomeAny timeNilAny amount of IncomeOn or before the due dateNilUp to Rs. 500,000After the due date1,000Above Rs. 500,000After the due date5,000


 8. Fee for default in linking Aadhaar and PAN


 As per Section 139AA, it is mandatory for every person, who is eligible to obtain Aadhaar, to quote the Aadhar Number (a 12-digit Unique Identification Number) in the Income-tax return and the application for allotment of PAN.


 Further, every person who has been allotted PAN as on July 1, 2017, and who is eligible to obtain Aadhaar number, shall link his PAN with Aadhaar. In case, assessee fails to do so, the PAN allotted to the person shall be made inoperative after the notified due date. The due date for such linking had been extended on multiple occasions and the latest date is 31-03-2021.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted a new Section 234H to levy a fee for default in intimating the Aadhaar Number. If a person is required to intimate his Aadhaar under Section 139AA(2) and such person fails to do so, he shall be liable to pay a fee, as may be prescribed, not exceeding Rs. 1,000 at the time of making such intimation.


 Therefore, if the person fails to link PAN-Aadhaar by 31-03-2021, he shall be liable to pay a fee, maximum of Rs. 1,000. This fee shall be in addition to the other consequences the person has to face if PAN becomes inoperative due to non-intimation of Aadhaar.


 As per Rule 114AAA, where a person is required to furnish, intimate or quote his PAN, and his PAN has become inoperative, it shall be deemed that he has not furnished, intimated or quoted the PAN. Consequently, he shall be liable for all the consequences for not furnishing, intimating or quoting the PAN. Some of these consequences have been enumerated below:


 The tax shall be deducted at a higher rate as per Section 206AA;


 The tax shall be collected at a higher rate as per Section 206CC;


 Taxpayers will not be able to file the return of income. Consequently, he shall be liable for the consequences of non-filing of a return, inter-alia, payment of late fee under section 234F, interest under section 234A, forfeiture of current year’s losses, best judgment assessment, the penalty for concealment of income, prosecution for failure to furnish return of income, so on and so forth;


 A penalty under Section 272B shall be levied as such person shall not be able to comply with the provisions of Section 139A requiring him to quote his PAN in certain financial transactions, etc.


 9. No re-computation of past year’s book profit if MAT credit has been utilised


 [Applicable from Assessment Year 2021-22]

 To provide relief to the taxpayers affected due to the outcome of Advance Pricing Agreement (APA) and Secondary Adjustment, the Finance Bill, 2021 has proposed to insert a new sub-section (2D) to Section 115JB. As per the proposed provision, the Assessing Officer, on an application by the assessee, shall re-compute the book profit of the past years and tax payable thereon if assessee’s current year’s income has increased due to APA or secondary adjustment. The CBDT may notify the manner for re-computing the book profits of past years by the Assessing Officer.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted two provisos to the proposed sub-section (2D) to Section 115JB. The first proviso provides that the benefit of re-computation of book profit under section 115(2D) shall be available only if the assessee has not utilised the MAT credit in any subsequent Assessment Year. In other words, if such assessee has utilised the MAT credit for payment of tax liability of any subsequent assessment year, he shall not be eligible to claim the benefit of Section 115(2D).


 In the second proviso, it is provided that the assessee can make an application for re-computation of book profit only for the past years beginning on or before Assessment Year 2020-21. Further, the assessee shall not be eligible to claim the interest on the refund, if any, arising to him on account of reduction in tax payable due to re-computation of profit of past years.


 10. Tax on ULIPs


 10.1 परिचय


 Unit Linked Insurance Plan (ULIP) is a life insurance product, which provides risk cover for the policyholder along with investment. In ULIP, a small amount of the premium paid by the individual goes to secure life and the rest of the money is invested in qualified stocks, bonds or mutual funds. Currently, the amount received under the ULIPs is exempt from tax.


 Section 10(10D) provides for exemption with respect to any sum received under ULIP, including the sum allocated by way of bonus on such policy. However, if the premium payable for any of the years during the term of the policy exceeds 10% of the actual capital sum assured, then no exemption under this section would be allowed with respect to the sum received under the policy. Such situation hereinafter referred to as ‘excess premium’.


 10.2 Amendment by the Finance Bill, 2021


 Besides restricting the exemption under Section 10(10D) for payment of excess premium, the Finance Bill, 2021 has proposed to insert Fourth and Fifth Proviso to Section 10(10D) that no exemption shall be available under this provision in respect of ULIPs issued on or after the 01-02-2021, if the amount of premium payable for any of the previous year during the term of the policy exceeds Rs. 2,50,000 (‘high premium ULIPs’). Further, if the premium is payable by a person for more than one ULIPs, the exemption shall be available only for those policies whose aggregate premium does not exceed Rs. 2,50,000, for any of the previous years during the term of any of the policy.


 The income arising from such high-premium ULIPs are proposed to be taxed under Section 112A. Consequently, the Finance Bill, 2021 has proposed to amend the definition of equity-oriented fund to cover the high premium ULIPs. Thus, the equity-oriented fund to cover the ULIPs if such fund invests minimum 90% (in case of investments in other units listed on a recognised stock exchange) or 65% (in any other case) in equity shares of a domestic company.


 10.3 Amendment by the Finance Bill (Lok Sabha)


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted second proviso to Section 112A that the minimum requirement of 90% or 65%, as the case may be, is required to be satisfied throughout the term of such insurance policy.


 Definition of ‘Liable to tax’ rephrased


 The definition of ‘liable to tax’ has been proposed to be inserted by the Finance Bill, 2021 in Section 2(29A). The proposed definition provides that “liable to tax”, in relation to a person, means that there is a liability of tax on such person under any law for the time being in force in any country, and shall include a case where subsequent to imposition of tax liability, an exemption has been provided.


 The definition proposed by the Finance Bill, 2021 does not specify the nature of tax which shall be considered for this purpose. In absence of specific reference to ‘Income-tax’, it could be concluded that if a person is paying any tax he may be regarded as liable to tax in such country.


 To remove this ambiguity, the Finance Bill (Lok Sabha) inserts a new definition of this term as under.


 “Liable to tax”, in relation to a person and with reference to a country, means that there is an income-tax liability on such person under the law of that country for the time being in force and shall include a person who has subsequently been exempted from such liability under the law of that country.


 Two major changes have been made in the Finance Bill (Lok Sabha) vis-à-vis Finance Bill, 2021. First, the liability shall be with reference to a country and second, there should be an income-tax liability.


 However, it has yet not been defined whether the comprehensive liability shall be considered for the purpose of this definition or even in case of source-based taxability, such person shall be considered as liable to tax in such country.


 12. No tax on income of ‘DFI’ and ‘Institution’ established for financing infrastructure and development


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 The Finance Minister, Smt. Nirmala Sithraman, in her budget speech said that infrastructure needs long-term debt financing. A professionally managed Developmental Financing Institution (DFI) is necessary to act as a provider, enabler and catalyst for infrastructure financing. Accordingly, the FM said that she shall introduce a Bill to set up a DFI.


 A DFI is an institution promoted or assisted by the Government mainly to provide development finance to one or more sectors or sub-sectors of the economy. The basic emphasis of a DFI is on long-term finance and on assistance for activities or sectors of the economy where the risks may be higher than that the ordinary financial system is willing to bear[1]. The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted two new clauses (48D) and (48E) to Section 10.


 12.1 Exemption to Financial Institution [Section 10(48D)]


 Section 10(48D) has been inserted to grant exemption for any income accruing or arising to an institution established for financing the infrastructure and development. The institution shall be set up under an Act of Parliament and later would be notified by the Central Government. The exemption shall be available for a period of 10 consecutive assessment year beginning from the assessment year relevant to the previous year in which such institution is set up.


 12.2 Exemption to DFI [Section 10(48E)]


 Section 10(48E) is inserted to provide the exemption to any income accruing or arising to a DFI licensed by the Reserve Bank of India. The exemption shall be available for 5 consecutive assessment years beginning from the assessment year relevant to the previous year in which the DFI is set up.


 However, the Central Government may extend the period of exemption of 5 years for a further period, not exceeding 5 more consecutive assessment years, subject to fulfilment of such conditions as may be specified.


 13. Due date to file return of income by the spouse of a partner


 If firm or LLP is required to get its accounts audited under Income-tax Act or any other law, the due date to file the return of income by such firm or LLP shall be 31st October of the assessment year. Similarly, the due date to file the return of income by the partner of such firm shall be 31st October. However, no such extended time limit was available to the spouse of that partner who is covered under Section 5A.


 Section 5A requires equal apportionment of income (except salary income) between spouses governed by the Portuguese Civil Code. Such provision is in the state of Goa and the Union Territories of Dadra & Nagar Haveli and Daman & Diu.


 Thus, the Finance Bill 2021 proposed that the due date for the filing of original return of income shall be extended to 31st October in case of spouse of a partner of a firm whose accounts are required to be audited under the Income-tax Act or under any other law for the time being in force, if the provisions of section 5A apply to them.


 The Finance Bill, 2021 also proposes that the due date for filing of return of income by the partners of a firm, which is required to furnish report under Section 92E, shall be 30th November of the assessment year. Therefore, in case of a firm which is required to furnish a Transfer Pricing report in Form 3CEB, the due date for filing of original return of income by the partner shall be 30th November of the assessment year. There was no corresponding extension to the spouse of the partner governed by Section 5A.


 The Finance Bill (Lok Sabha) extends the due date for the filing of return of income by the spouse of the partner of a firm, if governed by the provisions of section 5A, to 30th November where such firm is required to furnish report under Section 92E. Therefore, after the proposed amendments, the due dates in case of firm, its partners and spouse of partner governed by Portuguese Civil Code shall be as under:


 PersonFirm is not liable for auditFirm is liable for auditFirm is liable for TP AuditFirm31st July31st October30th NovemberPartner of Firm31st July31st October30th NovemberSpouse of Partner governed by Portuguese Civil Code31st July31st October30th November


 14. Due date for filing of belated and revised ITR


 If a return of income is not filed on or before the specified due date, it is regarded as a belated return. Further, the taxpayer has an option to revise a return to correct any error or omission in the original return. An assessee may file a revised or belated return for any previous year at any time before the expiry of the relevant assessment year or before completion of the assessment, whichever is earlier. Thus, as per the existing provisions, the last date to file the revised or belated return is 31st March of the relevant Assessment Year.


 The Finance Bill, 2021 proposed amendments to Section 139(4) and 139(5), with effect from the assessment year 2021-22, to provide that the belated and revised return can be filed at any time within three months prior to the end of the relevant assessment year or before completion of the assessment, whichever is earlier.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has redrafted the wordings of the proposed amendment although the intent remains the same. Now, it has been provided that the belated and revised return can be filed before three months prior to the end of the relevant assessment year or before the completion of the assessment, whichever is earlier.


 Thus, pursuant to the amendment, a belated and revised return in respect of assessment year 2021-22 and subsequent assessment years can be filed up to 31st December of that assessment year.


 15. New scheme of Re-Assessment


 15.1 Changes proposed by the Finance Bill, 2021


 The Finance Bill, 2021 proposes a new re-assessment procedure for an income which has escaped the assessment and in search and seizure cases. The Explanatory Memorandum stated that the new scheme of assessment would result in less litigation and would provide ease of doing business to the taxpayers. The Finance Bill substituted existing Sections 147, 148, 149 and 151 and inserted a new section 148A making a complete change in the assessment proceedings relating to income escaping assessment and search-related cases. Consequential amendments have also been proposed to Section 151A, 153A and 153C.


 The new Section 147 provides that the Assessing Officer can make the re-assessment of an income escaping assessment if the following conditions are satisfied:


 Any income chargeable to tax has escaped assessment for any assessment year;  तथा


 The assessing officer follows the provisions of sections 148 to 153.


 If the above conditions are satisfied, the assessing officer can assess or reassess such income or recompute the loss or the depreciation allowance or any other allowance or deduction for such assessment year. It is imperative to note that in view of Explanation to Section 147 the Assessing Officer can assess or reassess all those incomes which have escaped assessment and which come to his notice subsequently in the course of such proceeding notwithstanding that the procedure prescribed in section 148A was not followed before issuing such notice for such income.


 15.2 Power to assess or reassess for assessment or reassessment or recomputation


 The Finance Bill (Lok Sabha) has also covered ‘recomputation’ within the scope of the said Explanation to Section 147. Thus, the Assessing Officer for the purpose of assessment or reassessment or recomputation can assess or reassess all those incomes which have escaped assessment and which come to his notice subsequently in the course of such proceeding notwithstanding that the procedure prescribed in Section 148A was not followed before issuing such notice for such income.


 15.3 Information suggests income escaping in case of Survey


 The new scheme of reassessment proposes that the Assessing Officer can initiate the proceedings if he has the information which suggests that some income has escaped the assessment. Explanation 1 and 2 of the proposed Section 148 define the situation in which an assessing officer shall be deemed to have the information which suggests that the income chargeable to tax has escaped the assessment.


 Explanation 2 applies in the case of search, survey or requisition of books, documents or other assets. Explanation 1 applies in other cases.


 In search, survey or requisition cases initiated or made or conducted, on or after 01-04-2021, it shall be deemed that the Assessing Officer has information which suggests that the income chargeable to tax has escaped assessment in the case of the assessee for the 3 assessment years immediately preceding the assessment year relevant to the previous year in the following cases:


 A search is initiated under Section 132 or books of account, other documents or any assets are requisitioned under Section 132A, on or after the 01-04-2021, in the case of the assessee;


 A survey is conducted under section 133A in the case of the assessee;


 The Assessing Officer is satisfied, with the prior approval of PCIT or CIT, that any money, bullion, jewellery or other valuable article or thing, seized or requisitioned in case of any other person on or after the 01-04-20201, belongs to the assessee;  या


 The Assessing Officer is satisfied, with the prior approval of PCIT or CIT, that any books of account or documents, seized or requisitioned in case of any other person on or after 01-04-2021, pertains or pertain to, or any information contained therein, relate to, the assessee.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has excluded the survey under Section 133A(2A) and Section 133A(5) from the scope (point (b) mentioned above). Therefore, in the following surveys conducted under Section 133A, it shall not be deemed that the Assessing Officer has information which suggests that the income chargeable to tax has escaped assessment.


 Survey for verifying that tax has been deducted or collected at source in accordance with the provisions of sub-heading B of Chapter XVII or under sub-heading BB of Chapter XVII.


 Survey at any function, ceremony or event where, having regard to the nature and scale of expenditure incurred by an assessee.


 In other words, the assessing officer cannot initiate re-assessment proceedings merely based on the survey conducted in the above two cases.


 15.4 Information suggesting escapement of income in case of Requisition


 The Finance Bill, 2021 proposed that it shall be deemed that the Assessing Officer has the information which suggests that some income has escaped the assessment where the Assessing Officer is satisfied, with the prior approval of PCIT or CIT, that any money, bullion, jewellery or other valuable article or thing, seized or requisitioned in case of any other person on or after the 01-04-20201, belongs to the assessee.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has provided that this deeming fiction shall apply only in the case of requisition under Section 132 or Section 132A. Therefore, in case of any unauthorized requisition it shall not be deemed that the Assessing Officer has the information which suggests that some income has escaped the assessment.


 15.5 Meaning of ‘Asset’ representing the income escaping assessment


 The Finance Bill 2021 proposes the following time-limit for issuance of notice under Section 148 for re-assessment under Section 147.


 ParticularsTime Limit  In GeneralNo notice shall be issued if 3 years have elapsed from the end of the relevant assessment year.Where the Assessing Officer has evidence in his possession which reveals that the income escaping assessment, represented in the form of asset, amounts to or is likely to amount to Rs. 50 lakhs or more.Notice can be issued beyond a period of 3 years but not beyond the period of 10 years from the end of the relevant assessment year.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted an Explanation to new Section 149(1) to define the meaning of Asset. For this purpose, the asset shall include the following:


 Immovable property, being land or building or both;


 Shares and Securities;


 ऋण और अग्रिम;


 Deposits in Bank Account.


 Thus, the notice can be issued up to 10 years if the Assessing Officer has evidence in his possession which reveals that the income escaping assessment, represented in the form of any asset, amounts to or is likely to amount to Rs. 50 lakhs or more. The income escaping assessment may be represented by any immovable property, shares, securities, loans, advances, bank balance, sundry debtors, jewellery, cash-in-hand, stock-in-trade, paintings, other investments, etc.


 15.6 Exclusion of Time limit for Completion of Assessment


 While computing the period allowed for completion of assessment or reassessment, certain time periods are excluded. Where assessee approaches the Authority for Advance Ruling, the period to be excluded from the limitation period shall commence from the date on which an application is made before the AAR and end with the date on which the order rejecting such application or the Advance Ruling, as the case may be, is received by Principal CIT or CIT.


 The Finance Bill, 2021 proposed that the Authority for Advance Rulings shall cease to operate with effect from such date, as may be notified by the Central Government in the Official Gazette. The Central Government has been empowered to constitute one or more Board for Advance Rulings for giving advance rulings on and after the notified date.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has made consequential amendments to make the reference of Board for Advance Rulings along with the Authority for Advance Rulings in Section 153. Therefore, while computing the period of limitation, the period to be excluded from the limitation period shall commence from the date on which an application is made before the AAR or Board for Advance Rulings and end with the date on which the order rejecting such application or the Advance Ruling, as the case may be, is received by Principal CIT or CIT. Similar amendments have been made to Section 153B (time-limit for completion of assessment in search or requisition cases).


 15.7 Time-limit for completion of assessment on withdrawal of application filed before settlement commission


 The Finance Bill, 2021 proposed to discontinue the Income-tax Settlement Commission (‘ITSC’) with effect from 01-02-2021. It has been proposed to constitute an Interim board for settlement of cases pending with the Settlement Commission.


 The assessee (who had filed an application with the settlement commission) has the option to withdraw such application within 3 months from the date of commencement of the Finance Act, 2021. If not withdrawn, the application will be deemed to be received by the Interim Board on the date on which the application was allotted by the Board.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted fourth proviso after Explanation 1 to Section 153 to provide that if the assessee has exercised the option to withdraw the application filed before Settlement Commission, the period of limitation available to the assessing officer for making an assessment, reassessment or recomputation after the excluded time shall not be less than one year. If such period of limitation is less than one year, it shall be deemed to have been extended to one year.


 Similar amendments have been made to Section 153B (time-limit for completion of assessment in search or requisition cases). In such cases, the period shall stand extended to a minimum one year where assessee has exercised the option to withdraw the application filed before the Settlement Commission.


 This amendment shall also apply for determining the period of limitation in the following sections:


 For determination the period of limitation for issue of notice for re-assessment under Section 149;


 For filing of application for rectification of mistake apparent from record under Section 154;


 For other amendments as specified in Section 155;


 For payment of interest on refund under Section 244A.


 16. Pending Applications before AAR


 The Finance Bill, 2021 proposed that the Authority for Advance Rulings shall cease to operate with effect from such date, as may be notified by the Central Government in the Official Gazette. The Central Government has been empowered to constitute one or more Board for Advance Rulings for giving advance rulings on and after the notified date. Every such Board shall consist of two members, each being an officer not below the rank of Chief Commissioner.


 The Finance Bill, 2021 also proposed to amend Section 245Q (which deals with filing of application) that the application pending with the Authority, in respect of which order under section 245R(2) or section 245R(4) has not been passed before the notified date, shall be transferred to the Board for Advance Rulings along with all records, documents or material, by whatever name called and shall be deemed to be the records before the Board for all purposes.


 The Finance Bill (Lok Sabha) changed the reference from application filed under this Section to under this Chapter. Therefore, if any application is pending under Chapter XIX-B of the Income-tax Act in respect of which order under section 245R(2) or section 245R(4) has not been passed before the notified date shall be transferred to the Board for Advance Rulings.


17.  Scope of investment extended for exemption under Section 10(23FE)


 17.1 Introduction


 To encourage investments by Sovereign Wealth Fund (SWF) and Pension Fund (PF) into infrastructure sector of India, the Finance Act, 2020, has inserted clause (23FE) to Section 10 to provide an exemption from the income in the nature of dividend, interest or long-term capital gains arising from an investment made in India. This exemption was allowable subject to fulfilment of various conditions. One of such conditions provide that the specified person should invest in a Category-I or Category-II Alternative Investment Fund regulated under the SEBI (Alternative Investment Fund) Regulations, 2012 having 100% investment in one or more of the company or enterprise carrying on the business of developing, or operating and maintaining, or developing, operating and maintaining any infrastructure facility as defined in the Explanation to Section 80-IA(4)(i).


 17.2 Amendment by Finance Bill, 2021


 The Finance Bill, 2021 has proposed the following changes to section 10(23FE) with respect to types of eligible investments by the specified persons for claiming exemption under such section:


 Presently, SWF/PFs are not allowed to invest through holding company. It is proposed to allow the same through a domestic holding company of an infrastructure company if the prescribed conditions are fulfilled;


 Presently, SWF/PFs are not allowed to invest in NBFC-IFC/IDF. It is proposed to allow the same if the prescribed conditions are fulfilled.


 Currently the exemption could be availed only if the investment is made in Category I or II AIF having 100% investment in the Infrastructure companies. The Finance Bill, 2020, has proposed to relax this condition to reduce the holding limit for Category-I or Category-II AIFs from 100% to 50%. Further, it is proposed to allow these AIFs to invest in an Infrastructure Investment Trust (InvIT) in addition to these entities specified under Section 80-IA(4)(i) or notified entities.


 17.3 Amendment by the Finance Bill (Lok Sabha)


 The Finance Bill (Lok Sabha) has extended the relaxation with respect to further investment by the Category I or II AIF in any of the following entities:


 A domestic holding company registered on or after 01-04-2021 having a minimum 75% investments in one or more infrastructure companies;  या


 A NBFC-IDF/IFC having minimum 90% lending to one or more infrastructure entities.


 Further, the amendment has been made to provide that exemption under this clause shall be calculated proportionately if the aggregate investment of holding company in Infrastructure Company or companies or NBFC-IDF/IFC is less than 100%.


 Income of a non-resident from leasing of aircraft to a unit of an IFSC [Section 10(4F)]


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 The Finance Bill, 2021 has proposed to insert Section 10(4F) to provide exemption in respect of income of a non-resident by way of royalty on account of leasing of an aircraft to a unit located in an International Financial Services Centre (IFSC). The exemption is proposed to be allowed only when the following condition are satisfied:


 The unit of IFSC should be eligible for deduction under Section 80LA for the previous year in which aircraft is leased;  तथा


 The operations of the unit of IFSC must be commenced on or before 31-03-2024.


 18. The Finance Bill (Lok Sabha) has made the following changes to the said section:


 18.1 Exemption shall be available for both operating and finance lease charges


 A lease is an agreement whereby the lessor conveys the right to use an asset to the lessee for an agreed period. For conveying such rights, the lessor may receive lumpsum payment or series of payments from lessee (‘lease payment’). The nature of lease payment depends upon the lease agreement. It may be in the form of royalty or rent. Further, in case of finance lease where the lessee acquires the economic benefits of the use of the leased asset for the major part of its economic life, the lease payment may also be in the form of interest charged on the fair value of asset.


 Thus, considering the fact that the income from leasing may also be in the nature of interest, section 10(4F) is suitably amended to provide exemption in respect of interest income arising to a non-resident on account of leasing of aircraft to a unit of an IFSC.


 18.2 Condition of ‘Unit of IFSC to be eligible for deduction under section 80LA’ is removed


 The condition that the unit of IFSC should be eligible for deduction under Section 80LA for the previous year in which aircraft is leased has been removed. Thus, a non-resident shall be able to claim exemption under section 10(4F) even if the aircraft is leased to a unit of an IFSC which is not eligible for deduction under Section 80LA.


 18.3 Meaning of ‘aircraft’ is defined


 An Explanation has been inserted to Section 10(4F) to define the meaning of aircraft. It provides that the ‘aircraft’ means an aircraft or a helicopter, or an engine of an aircraft or a helicopter, or any part thereof.


 19. Exemption to be available to non-resident investors and Category-III AIF [Section 10(23FF)]


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 The Finance Bill, 2021 proposes to insert two new clauses (viiac) and (viiad) to Section 47. Clause (viiac) provides that any transfer of capital asset by a foreign investment fund (‘original fund’) to a fund located in IFSC (‘resultant fund’) in pursuance of its relocation to such IFSC, is not regarded as transfer for the purpose of computing capital gain. Similarly, clause (viiad) provides that transfer of shares, unit or interest held by an investor in original fund in consideration of share, unit or interest in resultant fund is also not regarded as transfer.


 Section 56(2)(x) provides for the taxability under the head other sources if any property is received by any person without or for inadequate consideration. This provision has also been proposed to be amended to exclude the transfer of property made in relation to relocation of foreign investment fund to IFSC. Thus, no taxability shall arise even in the hands of resultant fund on receipt of capital asset from the original fund.


 The expressions “original Fund”, “relocation” and “resultant fund” are defined under an explanation to clauses (viiac) and (viiad) of section 47.


 Here, it is to be noted that the relocation of foreign investment fund to IFSC is treated as a tax neutral transaction. However, when the resultant fund subsequently transfers the capital asset received from the original fund, it shall be regarded as transfer unless provided otherwise and, accordingly, capital gain arising from such transfer shall be chargeable to tax.


 The resultant fund is required to be registered as Alternative Investment Fund (AIF) with SEBI. AIFs (except Category-III AIF) are provided pass-through status under the Income-tax Act whereby they can pass their income (except income chargeable under the head business or profession) to their investors without paying tax thereon and, consequently, such income is chargeable to tax in the hands of the investors.


 As resultant fund is required to be incorporated and registered as AIF in India, its world-wide income is taxable in India. Whereas the taxability of foreign investment fund in India depends upon various factors such as its country of residence, nature of investment in India, place of business in India, provisions of double taxation avoidance agreement (DTAA) etc. Thus, it is possible that the foreign investment fund would not have been chargeable to tax in India if it had not been relocated to India. Thus, to provide relief in such cases, a new section 10(23FF) is also proposed to be inserted to provide exemption in respect of income in the nature of capital gains, arising or received by a non-resident, which is on account of transfer of share of a company resident in India by the resultant fund and such shares were transferred from the original fund to the resultant fund in relocation, if capital gains on such shares were not chargeable to tax had that relocation not taken place.


 The exemption under section 10(23FF) is proposed to be provided to non-resident investors of the resultant fund and not to the resultant fund itself. Thus, where the resultant fund is registered as category-III AIF, the taxability may arise in its hands because Category-III AIF is not recognized as pass-through entity under the Income-tax Act. Considering this fact, the Finance Bill (Lok Sabha) has made changes to Section 10(23FF) to provide exemption to Category-III AIF as well. However, Category-III AIF shall be entitled for the exemption only when it falls under the definition of specified fund as defined under clause (c) of the Explanation to section 10(4D). Further, the exemption shall be available only to the extent of income attributable to units held by non-resident (not being a permanent establishment of a non-resident in India) in such specified fund.


 Further, it is provided that Section 10(23FF) shall apply even in cases the resultant fund received the shares of a company resident in India from wholly owned special purpose vehicle of the original fund. Consequential amendment is made to the definition of ‘relocation’ as defined under Explanation to Clause (viiac) and Clause (viiad) of Section 47. The meaning of ‘resultant fund’ is also amended to provide that it can also be regulated under the International Financial Services Centres Authority Act, 2019.


 20. Taxation of Income from GDRs issued by Overseas Depository Bank situated outside India or IFSC [Section 115ACA]


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 Where an Indian company or its subsidiary, engaged in information technology, entertainment, pharmaceutical or biotechnology industry, distributes dividend in respect of Global Depository Receipts (GDRs) issued to its employees under an Employees’ Stock Option Scheme, the dividend is taxable at a concessional tax rate of 10% under Section 115ACA in the hands of the employee provided he is a resident in India and GDRs are purchased by him in foreign currency. Further, the long-term capital gain arising from transfer of such GDRs shall also be taxable at concessional rate of 10%.


 The GDR for this purpose is defined under clause (a) of the Explanation to said section to mean any instrument in the form of a depository receipt or certificate (by whatever name called) created by the Overseas Depository Bank outside India and issued to investors against the issue of:


 ordinary shares of issuing company, being a company listed on a recognised stock exchange in India;  या


 foreign currency convertible bonds of issuing company.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has amended the definition of GDRs to provide that they can be created by the Overseas Depository Bank in an International Financial Services Centre (IFSC) as well. Further, GDRs can also be issued against the issue of ordinary shares of issuing company, being a company incorporated outside India, if such depository receipt or certificate is listed and traded on any IFSC.


 IFSC is also defined to provide that it shall have the same meaning as assigned to it in clause (q) of section 2 of the Special Economic Zone Act, 2005.


 21. Regulations applicable in case of Category-I and Category-II AIFs [Section 115UB]


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 Category-I and Category-II Alternative Investment Funds (AIFs) are provided pass-through status under the Income-tax Act as per Section 115UB read with Section 10(23FBA) and Section 10(23FBB). The pass-through entitles pass their income (except income chargeable under the head business or profession) to their investors without paying tax thereon and, consequently, such income is chargeable to tax in the hands of the investors. Currently, section 115UB provides that AIFs should be registered with SEBI and regulated under the Securities and Exchange Board of India (Alternative Investment Fund) Regulations, 2012.


 However, where AIF is located in an International Financial Services Centre (IFSC), it is regulated under the International Financial Services Centres Authority Act, 2019. Thus, considering the same, the Finance Bill (Lok Sabha) has made an amendment to Section 115UB to provide that Category-I and Category-II AIF can also be regulated under the said Act.


 22. Transaction not regarded as transfer


 22.1 Transfer of capital asset by Indian Infra Finance Co. to an Institution established for financing infrastructure and development (Section 47(viiae)


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted a new clause (viiae) to Section 47 to provide that any transfer of a capital asset by Indian Infrastructure Finance Company Limited to institution established for financing infrastructure and development, set up under an Act of Parliament and notified by the Central Government, shall not be regarded as transfer.


 The consequential amendments have also been made to Section 49 to provide that the cost of a capital asset in the hands of the transferee shall be the same as in the hands of the transferor. Further, Section 56(2)(x) is also amended that this provision shall not apply in respect of transfer referred to in Section 47(viiae).


 22.2 Transfer of capital asset under a plan approved by Central government (Section 47(viiaf)


 The Finance Bill (Lok Sabha) has inserted a new clause (viiaf) to Section 47 to provide that any transfer of a capital asset by a public sector company to another notified public sector company, Central Government or State Government shall not be regarded as transfer. Such transfer must be under a plan approved by the Central Government.


 The consequential amendments have also been made to Section 49 to provide that the cost of a capital asset in the hands of the transferee shall be the same as in the hands of the transferor. Further, Section 56(2)(x) is also amended that this provision shall not apply in respect of transfer referred to in Section 47(viiaf).


 23. Performance of functions of Verification Unit


 The Taxation and Other Laws (Relaxation and Amendment of Certain Provisions) Act, 2020 inserted a new Section 144B, to provide the manner in which faceless assessment under Section 143(3) and best judgment assessment under Section 144 shall be conducted.


 The CBDT has been authorised to set up the following centres and units by specifying their respective jurisdiction.


 National Faceless Assessment Centre (NFAC);


 Regional Faceless Assessment Centres (RFAC);


 Assessment Units (AU);


 Verification Units (VU);


 Technical Units (TU);  


 Review Units (RU).


 The Verification Unit shall perform the function of verification, which includes enquiry, cross verification, examination of books of accounts, examination of witnesses and recording of statements, and such other functions as may be required for the purposes of verification.


 The Finance Bill 2021 (Lok Sabha) has provided that the function of verification unit under this section may also be performed by a verification unit located in any other faceless centre set up under the provisions of this Act or under any scheme notified under the provisions of this Act. The request for verification may also be assigned by the National Faceless assessment centre to such verification unit.


 24 Investment division of offshore banking unit to be registered as Category-I FPI and not as category-III AIF [Section 10(4D) and 115AD]


 [Applicable from Assessment Year 2022-23]


 The Finance Bill, 2021, has proposed to amend the definition of specified fund as provided under section 10(4D) to extend the benefit of exemption of this section to the investment division of offshore banking unit. The ‘investment division of offshore banking unit’ has been proposed to be defined as a unit which has been:


 granted a certificate of registration as a Category-III AIF and is regulated under the SEBI (AIF) Regulations, 2012, made under the SEBI Act, 1992 or which has commenced its operations on or before the 31-03-2024;  तथा


 fulfils such conditions including maintenance of separate accounts for its investment division, as may be prescribed.


 Corresponding amendment has also been proposed to Section 115AD for extending the benefit of concessional tax rate prescribed under that section to investment division of offshore banking unit. However, said unit was defined under Section 115AD as a unit registered as Category-III FPI under the SEBI (FPI) Regulations, 2019 made under the SEBI Act, 1992.


 Under the SEBI (FPI) Regulations, 2019, FPIs can be registered under 2 categories only – Category-I FPIs and Category-II FPIs. Thus, reference of Category-III FPI under section 115AD was inadvertently made.


 Now, the Finance Bill (Lok Sabha) has amended the definition of ‘investment division of offshore banking unit’ to provide that it should be granted registration as a Category-I Foreign Portfolio Investor under the SEBI (FPI) Regulations, 2019. Thus, instead of taking registration as Category-III AIF under SEBI (AIF) Regulations, 2012, it shall be required to take registration as Category-I FPI. This amendment is made both to section 10(4D) and section 115AD.


 Further, specified funds as defined under Section 10(4D) includes a fund established or incorporated in India in the form of a trust or a company or a LLP or a body corporate:


 Which has been granted a certificate of registration as a Category III AIF and is regulated under the SEBI (AIF) Regulations, 2012, made under the SEBI Act, 1992;


 Which is located in any International Financial Services Centre (IFSC);


 Entire units of which are held by non-residents other than unit held by a sponsor or manager.


 The Finance Bill (Lok Sabha) has amended the aforesaid definition to provide that such fund can also be regulated under International Financial Service Centres Authority Act, 2019.


 25 Curative amendments under section 115AD


 The Finance Bill, 2021, has proposed to amend the definition of specified fund provided under Section 10(4D) to include Investment division of offshore banking unit within its ambit. Consequently, Section 115AD has also been proposed to be amended to extend the benefit of concessional tax rates prescribed therein to such investment division of offshore banking unit. The proposed amendment has specifically inserted words “investment division of an offshore banking unit” after specified fund, whereas such investment unit were already covered within the meaning of specified fund by virtue of amendment proposed to Section 10(4D). To remove this error, the Finance Bill (Lok Sabha) has removed the reference of the ‘investment division of offshore banking unit’ wherever provided before the expression ‘specified fund’ under 115AD.


 The Taxation and Other Laws (Relaxation and Amendment of Certain Provisions) Act, 2020 (‘Amendment Act, 2020) substituted clause (i) of section 115AD(1) which provides for concessional tax rates on income from securities held by FPIs with effect from Assessment Year 2021-22 to provide tax rate in case of specified fund as defined under Section 10(4D). Before the said amendment, clause (i) of section 115AD(1) used to have a Proviso which provides for further concessional tax rate of 5% in respect of securities covered under section 194LD. But, in the clause (i) (as substituted by the Amendment Act, 2020), the said proviso was missing. Thus, there was no clarity whether such proviso would continue to be applicable or not after substitution of clause (i).


 To clarify this issue, the CBDT issued a press release dated 17-03-2021 and provided that such proviso shall continue to be applicable. Consequentially, the Finance Bill (Lok Sabha) has now made necessary amendment under the Amendment Act, 2020 and inserted the said proviso under the substituted clause (i) itself with effect from Assessment Year 2021-22.


 26. Changes to Indian Stamp Act


 26.1 परिचय


 As per the provisions contained under the Indian Stamp Act, 1899 stamp duty is payable on execution of transaction or the instrument. Stamp duty is levied on specified transactions at the rates specified by various Stamps Acts which includes Central and State Acts.


 26.2 Amendment by Finance Bill, 2021


 The Finance Bill, 2021 proposed to amend various sections to make the reconstruction or splitting up of a public sector company into separate companies a tax neutral transaction. The Finance Bill, 2021 has also proposed that such splitting up or reconstruction shall be regarded as demerger under Section 2(19AA) provided various conditions are satisfied. In addition to this, set off and carry forward of losses would be allowed if proposed conditions under section 72AA are complied with.


 India Stamp Act, 1899 has also been proposed to be amended that stamp duty will not be levied if the following conditions were satisfied:


 There is an instrument for conveyance or transfer of a business or asset or right in any immovable property;


 Transfer is made from a Government company, its subsidiary, unit or joint venture, to another Government company or to the Central Government or any State Government;


 Reconstruction was done by way of:


 Strategic sale;


 Disinvestment;


 Demerger;  


 Any other scheme of arrangement.


 26.3 Amendment by the Finance Bill (Lok Sabha)


 The Finance Bill (Lok Sabha) has amended the Indian Stamp Act, 1899 to extend the waiver of the stamp duty even if transfer is made to the development financial institution established by any law made by the parliament.


 Further, the Stamp duty will not be charged under the Act if the Government companies under the following stages are transferred to another Government Company or to the Central Govt. or the State Govt.:


 Winding up;

 Closing;

 Striking-off;

 Liquidation;  

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